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Breaking News : यथार्थ अस्पताल में इलाज के दौरान लापरवाही का आरोप, कोर्ट ने FIR दर्ज करने के दिए आदेश, महिला मरीज के ऑपरेशन के बाद लगातार दर्द की शिकायत, परिजनों ने डॉक्टरों पर गंभीर आरोप लगाए; एसीजेएम कोर्ट के आदेश के बाद थाना बीटा-2 पुलिस करेगी जांच, ऑपरेशन के बाद भी दर्द कम नहीं हुआ

शिकायतकर्ता एडवोकेट धीरेंद्र भाटी ने यथार्थ अस्पताल के मालिक कपिल त्यागी, डॉ. हमीदी, डॉ. इकबाल और संबंधित मेडिकल टीम पर आरोप लगाते हुए कहा कि उपचार में कथित लापरवाही के कारण मरीज को गंभीर परेशानी से गुजरना पड़ा। प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया कि चिकित्सकों को मरीज की स्थिति की जानकारी थी, लेकिन इसके बावजूद कथित तौर पर उपचार में हुई कमी को छिपाने का प्रयास किया गया। शिकायतकर्ता ने मामले की जांच कर दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की।

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। यथार्थ अस्पताल, ग्रेटर नोएडा में उपचार के दौरान कथित चिकित्सकीय लापरवाही के मामले में गौतमबुद्धनगर की अदालत ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, गौतमबुद्धनगर की अदालत ने धारा 173(4) बीएनएसएस के तहत प्रस्तुत प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए थाना बीटा-2 पुलिस को संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर नियमानुसार विवेचना करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने पुलिस से कार्रवाई की रिपोर्ट भी निर्धारित अवधि में प्रस्तुत करने को कहा है।

यह मामला एक महिला मरीज राखी के उपचार से जुड़ा है। प्रार्थी एडवोकेट धीरेंद्र की ओर से अदालत में दाखिल प्रार्थना पत्र में यथार्थ अस्पताल के चिकित्सकों और स्टाफ पर उपचार में गंभीर लापरवाही बरतने के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, ये आरोप जांच के अधीन हैं और अदालत के आदेश का अर्थ आरोपों का न्यायिक रूप से सिद्ध होना नहीं है। अब पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज किए जाने और विवेचना के बाद ही मामले के तथ्यों की स्थिति स्पष्ट होगी।

पेट में दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल पहुंची थीं राखी

अदालती दस्तावेजों के अनुसार, प्रार्थी की पत्नी राखी को पेट में लगातार असहनीय दर्द और कंधे में दर्द की शिकायत थी। पेट में फ्लूड एकत्र होने की बात भी सामने आई। इसके बाद परिजन उन्हें यथार्थ अस्पताल लेकर पहुंचे। दस्तावेजों के मुताबिक, 30 मई 2025 को राखी का अल्ट्रासाउंड कराया गया, जिसमें पित्ताशय (Gallbladder) में पथरी होने की जानकारी सामने आई। इसके बाद परिजनों ने यथार्थ अस्पताल के चिकित्सक डॉ. हमीदी से संपर्क किया। आरोप है कि चिकित्सक ने तत्काल ऑपरेशन की सलाह दी। परिजनों के अनुसार, इसके बाद 31 मई 2025 को अस्पताल में लैप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टॉमी (Laparoscopic Cholecystectomy) की गई। ऑपरेशन के बाद मरीज को पोस्ट ऑपरेटिव रूम से कमरे में शिफ्ट कर दिया गया।

ऑपरेशन के बाद भी दर्द कम नहीं हुआ

शिकायत के अनुसार, ऑपरेशन के बाद भी राखी को पेट और कंधे में लगातार दर्द बना रहा। परिजनों ने डॉक्टर से इसकी जानकारी साझा की। आरोप है कि दर्द को ऑपरेशन के बाद होने वाली सामान्य समस्या बताते हुए दवाएं दी जाती रहीं। बाद में मरीज के परिजनों को कथित तौर पर अस्पताल के स्टाफ से पता चला कि पित्त की थैली के अलावा एक अन्य स्टोन होने की बात सामने आई थी। दस्तावेजों में यह भी उल्लेख है कि मरीज की परेशानी लगातार बनी रही और परिवार ने उपचार को लेकर चिकित्सकों से सवाल किए। स्थिति में सुधार नहीं होने पर परिजनों ने अन्य चिकित्सकीय राय लेने का निर्णय लिया। इसके बाद राखी को दूसरे अस्पताल ले जाया गया, जहां जांचों के दौरान पेट में पथरी होने की बात सामने आने का दावा किया गया।

गंभीर स्थिति में दूसरे अस्पताल ले जाने का दावा

अदालत में दिए गए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया कि यथार्थ अस्पताल में उपचार के दौरान मरीज की गंभीर स्थिति और उपचार से जुड़ी पूरी जानकारी परिजनों को समय पर नहीं दी गई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यदि उन्हें समय रहते वास्तविक स्थिति की जानकारी मिल जाती तो वे मरीज को दूसरे विशेषज्ञ केंद्र में ले जा सकते थे। दस्तावेजों के मुताबिक, 4 जून 2025 की शाम मरीज का एमआरसीपी कराया गया। इसके बाद परिजनों को उपचार के संबंध में कुछ जानकारी मिली। शिकायतकर्ता का कहना है कि इसके बावजूद मरीज को पेट और कंधे में राहत नहीं मिली। इसके बाद मरीज को मैक्स अस्पताल, साकेत ले जाया गया, जहां दोबारा शल्य चिकित्सा की गई। दस्तावेजों के अनुसार, 6 जून 2025 को मरीज की सर्जरी हुई, जिसके दौरान कथित तौर पर पेट से गॉलब्लैडर का शेष हिस्सा और एक स्टोन निकाला गया। इसके बाद मरीज को राहत मिलने की बात शिकायत में कही गई है।

अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों पर गंभीर आरोप

शिकायतकर्ता एडवोकेट धीरेंद्र भाटी ने यथार्थ अस्पताल के मालिक कपिल त्यागी, डॉ. हमीदी, डॉ. इकबाल और संबंधित मेडिकल टीम पर आरोप लगाते हुए कहा कि उपचार में कथित लापरवाही के कारण मरीज को गंभीर परेशानी से गुजरना पड़ा। प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया कि चिकित्सकों को मरीज की स्थिति की जानकारी थी, लेकिन इसके बावजूद कथित तौर पर उपचार में हुई कमी को छिपाने का प्रयास किया गया। शिकायतकर्ता ने मामले की जांच कर दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अदालत के आदेश से नहीं हुई है। मामले में अब पुलिस जांच महत्वपूर्ण होगी, जिसमें मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन से संबंधित दस्तावेज, अल्ट्रासाउंड और अन्य जांच रिपोर्ट, चिकित्सकीय राय तथा संबंधित डॉक्टरों एवं स्टाफ के बयान शामिल किए जा सकते हैं।

पहले भी की गई थी शिकायत

अदालती दस्तावेजों में उल्लेख है कि शिकायतकर्ता की ओर से मामले को लेकर संबंधित अधिकारियों को पहले भी शिकायतें दी गई थीं। 3 जुलाई 2025 को थाना बीटा-2 में शिकायत दी गई, जबकि इसके बाद पुलिस उपायुक्त और जिलाधिकारी समेत अन्य अधिकारियों को भी प्रार्थना पत्र दिए जाने का उल्लेख दस्तावेजों में है। मामले की जांच के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी की ओर से एक समिति गठित किए जाने का भी दस्तावेजों में उल्लेख है। समिति में वरिष्ठ चिकित्सकों को शामिल किया गया था। समिति की जांच रिपोर्ट के संबंध में भी शिकायतकर्ता ने अदालत के समक्ष अपने पक्ष और आपत्तियां रखीं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि विभिन्न स्तरों पर शिकायत देने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट ने पुलिस को FIR दर्ज कर विवेचना के दिए निर्देश

अदालत ने प्रार्थना पत्र, उपलब्ध दस्तावेजों और मामले से संबंधित तथ्यों का अवलोकन करने के बाद 12 अगस्त 2026 को आदेश पारित किया। आदेश में थाना बीटा-2 पुलिस को निर्देश दिया गया है कि मामले में संलिप्त बताए गए व्यक्तियों के खिलाफ सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर नियमानुसार विवेचना की जाए और कार्रवाई की रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए। अदालत के आदेश के बाद अब पुलिस के सामने मामले की निष्पक्ष जांच की जिम्मेदारी है। जांच में यह पता लगाया जाएगा कि मरीज के ऑपरेशन और बाद के उपचार में चिकित्सकीय प्रोटोकॉल का पालन किया गया था या नहीं, मरीज की स्थिति की सही जानकारी परिजनों को दी गई थी या नहीं तथा उपचार में किसी स्तर पर आपराधिक लापरवाही हुई या नहीं।

मेडिकल रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट होंगी अहम

इस पूरे मामले में अस्पताल की मेडिकल फाइल, ऑपरेशन नोट, अल्ट्रासाउंड और अन्य इमेजिंग रिपोर्ट, एमआरसीपी रिपोर्ट, डिस्चार्ज समरी, दवाओं का रिकॉर्ड तथा दूसरे अस्पताल में हुई सर्जरी से जुड़े दस्तावेज जांच के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। पुलिस जांच के साथ मेडिकल विशेषज्ञों की राय भी यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होगी कि मरीज की चिकित्सा स्थिति क्या थी और उपचार के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया निर्धारित चिकित्सकीय मानकों के अनुरूप थी या नहीं।

अदालत के आदेश के बाद मामला अब न्यायिक जांच के अगले चरण में पहुंच गया है। पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज किए जाने और विवेचना पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और उपचार के दौरान वास्तव में किसी प्रकार की चिकित्सकीय अथवा आपराधिक लापरवाही हुई थी या नहीं।

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