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Education Scam : नोएडा-ग्रेटर नोएडा के पेरेंट्स की टेंशन हाई!, महंगी किताबें और स्टेशनरी ने बिगाड़ा बजट, स्कूलों की मनमानी पर फूटा गुस्सा, महंगी शिक्षा बनी सिरदर्द, सरकार से गुहार

नोएडा/ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत होते ही नोएडा और ग्रेटर नोएडा के अभिभावकों की परेशानी बढ़ गई है। स्कूलों में किताबों और स्टेशनरी के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट गड़बड़ा गया है। कई स्कूलों ने अपने परिसर में ही बुक स्टॉल लगवाकर अभिभावकों को मजबूर कर दिया है कि वे वहीं से महंगी दरों पर किताबें और कॉपियां खरीदें।

स्कूलों की मनमानी से परेशान पेरेंट्स

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कई स्कूलों में 25 मार्च से नया सत्र शुरू हो गया है। लेकिन इस बार नए सत्र की शुरुआत अभिभावकों के लिए खुशी के बजाय चिंता लेकर आई है। किताबों और स्टेशनरी के दाम पिछले साल की तुलना में 15-20% तक बढ़ गए हैं। कई स्कूलों में पेरेंट्स को यह कहकर मजबूर किया जा रहा है कि वे स्कूल के अधिकृत विक्रेता से ही किताबें और स्टेशनरी खरीदें, वरना उनके बच्चों को एडमिशन में दिक्कत आ सकती है।

ग्रेटर नोएडा स्थित स्पर्श ग्लोबल स्कूल में एक पेरेंट ने बताया कि जब वे सिर्फ कॉपियां खरीदने के लिए गए, तो बुकसेलर ने मना कर दिया और कहा कि केवल पूरी सेट ही खरीदी जा सकती है। अभिभावक को प्रिंसिपल या स्कूल मैनेजमेंट से लिखवाकर लाने के लिए कहा गया, जिससे साफ जाहिर होता है कि स्कूल प्रबंधन और बुकसेलर के बीच मिलीभगत है।

महंगी शिक्षा बनी सिरदर्द, सरकार से गुहार

एक अभिभावक ने अपनी शिकायत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, गौतमबुद्ध नगर के डीएम और बेसिक शिक्षा अधिकारी को ट्वीट कर दी है। उन्होंने कहा, “कृपया हमें इस महंगाई से बचाएं! स्कूल वाले बहुत ज्यादा कीमत वसूल रहे हैं। अगर स्थिति ऐसी ही रही तो हम अपने बच्चों को पढ़ाने में असमर्थ हो जाएंगे।”

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कई नामी स्कूलों ने भी किताबों की कीमतों में भारी वृद्धि की है। एक अभिभावक ने बताया कि पिछले साल जो किताबों का सेट 6,500 रुपये में आया था, वही इस बार 8,000 रुपये से ज्यादा में मिल रहा है। स्टेशनरी और यूनिफॉर्म की कीमतों में भी 20% तक की वृद्धि देखी गई है।

अभिभावकों की मांग – सरकारी हस्तक्षेप हो!

अभिभावकों की मांग है कि सरकार इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करे और स्कूलों को अनावश्यक शुल्क और महंगे किताबों के सेट खरीदने के लिए पेरेंट्स को मजबूर करने से रोके। कई अभिभावकों ने कहा कि सरकार को एक नियामक संस्था बनानी चाहिए जो स्कूलों द्वारा लिए जा रहे अनावश्यक शुल्क और मनमानी बढ़ोतरी पर निगरानी रख सके।

शिक्षा का निजीकरण और स्कूलों की यह व्यावसायिक मानसिकता बच्चों की शिक्षा को बाधित कर सकती है। ऐसे में अभिभावक अब जागरूक होकर सोशल मीडिया और सरकारी अधिकारियों तक अपनी आवाज पहुंचा रहे हैं।

क्या कहते हैं शिक्षा विभाग के अधिकारी?

शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अगर कोई स्कूल अभिभावकों को मजबूर कर रहा है कि वे केवल उन्हीं के अधिकृत विक्रेता से किताबें और स्टेशनरी खरीदें, तो यह एक गंभीर मामला है। अभिभावक इसकी शिकायत कर सकते हैं और कार्रवाई की जाएगी।

अंत में सवाल – क्या बदलेगी व्यवस्था?

अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या सरकार और प्रशासन अभिभावकों की इस गुहार पर ध्यान देते हैं या फिर शिक्षा के नाम पर चल रही इस लूट को नजरअंदाज कर दिया जाएगा। पेरेंट्स की बढ़ती नाराजगी को देखते हुए आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शन भी हो सकते हैं।

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