CMO Corruption News : स्वास्थ्य का रखवाला या सिस्टम का रक्षक?, CMO नरेंद्र कुमार पर गंभीर आरोपों की बरसात, रिश्वतखोरी के वीडियो से मचा हड़कंप, नोएडा का हेल्थ सिस्टम सवालों के घेरे में, वायरल वीडियो ने खोली पोल, लेकिन कार्रवाई नदारद, झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई सिर्फ फाइलों में?

नोएडा, रफ़्तार टूडे। गौतम बुद्ध नगर के स्वास्थ्य तंत्र को लेकर एक बार फिर बड़े और गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार आरोपों के केंद्र में हैं ग्रेटर नोएडा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) नरेंद्र कुमार। रिश्वत लेते स्वास्थ्यकर्मी का कथित वीडियो वायरल होने के बाद न सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली कटघरे में आई है, बल्कि यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या पूरा सिस्टम कुछ चुनिंदा लोगों को बचाने में जुटा है?
वायरल वीडियो ने खोली पोल, लेकिन कार्रवाई नदारद
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसमें एक स्वास्थ्यकर्मी को कथित तौर पर रिश्वत लेते हुए देखा जा रहा है। वीडियो सामने आने के बाद आमतौर पर जिस त्वरित कार्रवाई की उम्मीद की जाती है—निलंबन, जांच या एफआईआर—वह कहीं नजर नहीं आई।
इसके उलट, आरोप है कि संबंधित कर्मी को सस्पेंड करने के बजाय चुपचाप सीएचसी बिसरख ट्रांसफर कर दिया गया, ताकि मामला ठंडे बस्ते में चला जाए।
कार्रवाई या सिर्फ खानापूर्ति?
स्वास्थ्य विभाग में यह पहली बार नहीं है जब भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों, लेकिन इस बार मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि सबूत वीडियो के रूप में सार्वजनिक हैं। इसके बावजूद अगर आरोपी पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो यह पूरे सिस्टम की साख पर सवालिया निशान है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि वसूलीबाज कर्मचारियों पर सीएमओ की विशेष मेहरबानी है, जिसके चलते ऐसे मामलों को दबा दिया जाता है।
झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई सिर्फ फाइलों में?
नोएडा और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में झोलाछाप डॉक्टरों और फर्जी क्लीनिकों की भरमार है। आए दिन बिना डिग्री, बिना रजिस्ट्रेशन इलाज करने वाले कथित डॉक्टर मरीजों की जान से खेलते नजर आते हैं।
हालांकि, स्वास्थ्य विभाग समय-समय पर अभियान चलाने की बात करता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ये अभियान कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं।
सवाल यह है कि आखिर झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या इन फर्जी क्लीनिकों के पीछे भी किसी बड़े संरक्षण की छाया है?
फोन करने पर CMO की चुप्पी
इस पूरे मामले में जब मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने CMO नरेंद्र कुमार से संपर्क करने की कोशिश की, तो आरोप है कि उन्होंने फोन कॉल्स का जवाब देने से इनकार कर दिया।
एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी की यह चुप्पी कई सवालों को जन्म देती है—
क्या विभाग के पास जवाब नहीं हैं?
या फिर जवाब देना ही जरूरी नहीं समझा जा रहा?
स्वास्थ्य सेवाओं पर जनता का भरोसा डगमगाया
गौतम बुद्ध नगर जैसे तेजी से विकसित हो रहे जिले में, जहां लाखों की आबादी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर है, वहां इस तरह के आरोप बेहद चिंताजनक हैं।
गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार पहले ही महंगे निजी अस्पतालों के बोझ से परेशान हैं। ऐसे में अगर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था भी भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ जाए, तो आम नागरिक जाए तो जाए कहां?
https://twitter.com/i/status/2019417156979708090
ट्रांसफर बनाम सस्पेंशन: सिस्टम की पुरानी बीमारी
यह कोई नया ट्रेंड नहीं है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे कर्मचारियों को सजा देने के बजाय ट्रांसफर कर दिया जाए। जानकारों का मानना है कि यह तरीका दोषियों को बचाने और सिस्टम को बचाने का आसान रास्ता बन चुका है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रांसफर से भ्रष्टाचार खत्म हो जाता है, या वह सिर्फ जगह बदल लेता है?
https://twitter.com/i/status/2019417156979708090
जांच की मांग तेज, शासन-प्रशासन से उम्मीद
मामला अब सिर्फ एक वीडियो या एक अधिकारी तक सीमित नहीं रह गया है। यह पूरे स्वास्थ्य सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और जागरूक लोगों की मांग है कि—वायरल वीडियो की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो
दोषी पाए जाने पर संबंधित कर्मियों पर कठोर कार्रवाई की जाए
झोलाछाप डॉक्टरों और फर्जी क्लीनिकों के खिलाफ जमीनी स्तर पर अभियान चलाया जाए
और सबसे अहम, स्वास्थ्य विभाग में जीरो टॉलरेंस नीति को वास्तव में लागू किया जाए
अब निगाहें शासन पर
अब यह देखना अहम होगा कि जिला प्रशासन, प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह धूल फांकता रह जाएगा, या फिर वास्तव में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा?
नोएडा की जनता जवाब चाहती है।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक अधिकारी का नहीं, लाखों लोगों के स्वास्थ्य और भरोसे का है।



