Expoआम मुद्देगौतमबुद्ध नगरग्रेटर नोएडाबिजनेस

Breaking News : लकड़ी के हस्तशिल्प निर्यातकों की गुहार, ईयूडीआर नियमों पर सरकार से हस्तक्षेप की मांग, कारीगरों के भविष्य पर संकट, निर्यात के आंकड़े बढ़ते बाजार पर मंडराता संकट, यूरोपीय संघ के नियम और भारत की हकीकत

Breaking News : लकड़ी के हस्तशिल्प निर्यातकों की गुहार, ईयूडीआर नियमों पर सरकार से हस्तक्षेप की मांग, कारीगरों के भविष्य पर संकट, निर्यात के आंकड़े बढ़ते बाजार पर मंडराता संकट, यूरोपीय संघ के नियम और भारत की हकीकत

दिल्ली/एनसीआर, रफ़्तार टुडे।
भारतीय लकड़ी के हस्तशिल्प उद्योग, जो लाखों कारीगरों की आजीविका का आधार है, आज गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। यूरोपीय संघ (EU) के वन विनाश नियम (EUDR – European Union Deforestation Regulation) ने भारत से होने वाले लकड़ी हस्तशिल्प निर्यात पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं। इस पृष्ठभूमि में, हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद (EPCH) के उपाध्यक्ष श्री सागर मेहता के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने भारत सरकार के केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की।

बैठक का उद्देश्य: सरकार तक पहुंचाई गई चिंताएं

बैठक का मुख्य मकसद था सरकार को यह अवगत कराना कि EUDR अनुपालन की कठोर शर्तें भारत के लकड़ी हस्तशिल्प निर्यातकों के लिए कितनी कठिन साबित हो सकती हैं।

बैठक में ईपीसीएच, सहारनपुर वुड कार्विंग एसोसिएशन और जोधपुर हस्तशिल्प निर्यातक संघ सहित कई संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। निर्यातकों ने मंत्री को बताया कि अगर नियमों को भारत की परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना लागू किया गया, तो हजारों कारीगर और एमएसएमई निर्यातक रोजगार से वंचित हो सकते हैं।

यूरोपीय संघ के नियम और भारत की हकीकत

ईयूडीआर का उद्देश्य वनों की कटाई को रोकना है, जो सराहनीय कदम है। लेकिन भारतीय निर्यातकों का कहना है कि उनके उत्पाद वन कटाई से जुड़ी लकड़ी पर आधारित नहीं होते। भारत में लकड़ी हस्तशिल्प के लिए मुख्यतः आम, बबूल और शीशम जैसी लकड़ियों का उपयोग होता है।

ये पेड़ प्राकृतिक जंगलों में नहीं, बल्कि कृषि वानिकी के तहत उगाए जाते हैं। ऐसे में इन पर वनों की कटाई से जुड़े नियम लागू करना अन्यायपूर्ण और अव्यावहारिक है।

ईपीसीएच अध्यक्ष डॉ. नीरज खन्ना का बयान

“हम यूरोपीय संघ की मंशा का सम्मान करते हैं, लेकिन ईयूडीआर की मौजूदा शर्तें हमारे हस्तशिल्प निर्यात को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं। अगर ये नियम बिना संशोधन लागू हुए, तो उत्पादन घटेगा, ऑर्डर कैंसिल होंगे और लाखों कारीगर बेरोजगार हो जाएंगे।”

हस्तशिल्प उद्योग पर संभावित प्रभाव

  1. निर्यात ऑर्डर्स में गिरावट – यूरोप भारत का बड़ा बाजार है। नियमों के कारण ऑर्डर रद्द हो सकते हैं।
  2. कारीगरों पर असर – ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के लाखों कारीगर प्रभावित होंगे।
  3. एमएसएमई संकट – छोटे उद्यमों के पास इतने कठोर अनुपालन की व्यवस्था करने के संसाधन नहीं होंगे।
  4. बेरोजगारी का खतरा – लाखों परिवारों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़

ईपीसीएच के उपाध्यक्ष श्री सागर मेहता ने बैठक में कहा:

“हस्तशिल्प क्षेत्र सिर्फ एक उद्योग नहीं, बल्कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत के लाखों कारीगरों की आर्थिक रीढ़ है। अगर सरकार ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया तो इसका सीधा असर गांव-गांव तक दिखाई देगा।”

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को मंत्रालयों के बीच अंतर-मंत्रालयी समिति बनाकर एक डिजिटल ट्रेसेबिलिटी सिस्टम तैयार करना चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ भारत की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखकर समाधान निकाला जा सके।


जोधपुर और सहारनपुर के प्रतिनिधियों की राय

श्री हंसराज बाहेती (जोधपुर) ने कहा कि नियमों का सख्त अनुपालन एमएसएमई और कारीगर-आधारित उद्यमों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

श्री मोहम्मद औसाफ (सहारनपुर) ने बताया कि सहारनपुर का वुड कार्विंग उद्योग पूरी तरह कृषि वानिकी पर आधारित है, ऐसे में इसे “वन कटाई” की श्रेणी में रखना अनुचित है।


निर्यात के आंकड़े: बढ़ते बाजार पर मंडराता संकट

ईपीसीएच के कार्यकारी निदेशक श्री आर. के. वर्मा ने बताया कि:

वर्ष 2024-25 में भारत से कुल हस्तशिल्प निर्यात ₹33,123 करोड़ (3,918 मिलियन USD) का हुआ।

इनमें से केवल काष्ठ हस्तशिल्पों का निर्यात ₹8,524.74 करोड़ (1,008.04 मिलियन USD) रहा।

अकेले यूरोपीय संघ को निर्यात का मूल्य रहा ₹2,591.29 करोड़ (306.40 मिलियन USD)।

पिछले वर्ष की तुलना में निर्यात में रुपये के लिहाज़ से 6% की वृद्धि और डॉलर में 3.84% की वृद्धि दर्ज की गई।

अगर ईयूडीआर लागू हो गया, तो यह वृद्धि रुक सकती है और भारत का एक बड़ा बाजार खतरे में आ जाएगा।


स्थायी और जिम्मेदार व्यापार के प्रति भारत की प्रतिबद्धता

निर्यातकों ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत का लकड़ी हस्तशिल्प उद्योग हमेशा से स्थायी (Sustainable) और जिम्मेदार व्यापार का समर्थन करता रहा है।

ईपीसीएच की ‘वृक्ष योजना’ (Timber Legality Assessment and Verification Scheme) पहले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है।

यह योजना सुनिश्चित करती है कि भारत से निर्यात होने वाली लकड़ी वैध और स्थायी स्रोत से ही प्राप्त होती है।

लेकिन जियो-लोकेशन आधारित ट्रैसेबिलिटी सिस्टम के लिए सरकार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।

IMG 20250902 WA0054 converted
लकड़ी के हस्तशिल्प निर्यातकों की गुहार, ईयूडीआर नियमों पर सरकार से हस्तक्षेप की मांग, कारीगरों के भविष्य पर संकट



कारीगरों की आजीविका और भारत की पहचान दांव पर

लकड़ी के हस्तशिल्प सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और कला का जीवंत प्रतीक हैं।
अगर ईयूडीआर नियमों को भारत की हकीकत को समझे बिना लागू किया गया, तो यह न केवल निर्यातकों के लिए संकट बनेगा, बल्कि लाखों कारीगरों की आजीविका छिन सकती है।

सरकार और उद्योग के बीच साझा संवाद और ठोस नीति ही इस चुनौती का समाधान है। भारत को चाहिए कि वह वैश्विक सस्टेनेबिलिटी लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित अनुपालन ढांचा तैयार करे, ताकि पर्यावरण की रक्षा भी हो और कारीगरों की आजीविका भी सुरक्षित रहे।

प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख मांगें

  1. अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन।
  2. राष्ट्रीय लकड़ी पोर्टल की स्थापना।
  3. लाइसेंस प्राप्त आरा मिलों की रजिस्ट्री का प्रकाशन।
  4. डिजिटल ट्रेसेबिलिटी और जियो-लोकेशन फ्रेमवर्क।
  5. कृषि वानिकी आधारित लकड़ी (आम, बबूल, शीशम) से बने हस्तशिल्प को छूट या स्थगन।

बैठक के दौरान मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने प्रतिनिधियों की बातों को ध्यान से सुना और आश्वासन दिया कि

कारीगरों और निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए सकारात्मक कदम उठाए जाएंगे।

कारीगरों की आजीविका और भारत की पहचान दांव पर

लकड़ी के हस्तशिल्प सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और कला का जीवंत प्रतीक हैं।
अगर ईयूडीआर नियमों को भारत की हकीकत को समझे बिना लागू किया गया, तो यह न केवल निर्यातकों के लिए संकट बनेगा, बल्कि लाखों कारीगरों की आजीविका छिन सकती है।

सरकार और उद्योग के बीच साझा संवाद और ठोस नीति ही इस चुनौती का समाधान है। भारत को चाहिए कि वह वैश्विक सस्टेनेबिलिटी लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित अनुपालन ढांचा तैयार करे, ताकि पर्यावरण की रक्षा भी हो और कारीगरों की आजीविका भी सुरक्षित रहे।

रफ़्तार टुडे की न्यूज़
Raftar Today
Raftar Today

Related Articles

Back to top button