Breaking News :ऑपरेशन ‘इंद्रलोकपुरम’, जब भूमाफिया के हौसले बुलंद और सिस्टम पस्त दिखा!, अवैध कॉलोनियों के आगे क्यों बेदम हैं UPSIDA, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण, पुलिस और प्रशासन?, UP का शो-विंडो जिला बनता जा रहा ‘अवैध कॉलोनियों की राजधानी’, ब्रिटिश कालीन सर्चलाइट स्तंभ और पुरातत्व भूमि पर अतिक्रमण की आशंका

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। उत्तर प्रदेश की पहचान माने जाने वाले नोएडा-ग्रेटर नोएडा और इन्हें नियंत्रित करने वाला गौतम बुद्ध नगर जिला आज एक गंभीर और खतरनाक सच्चाई से जूझ रहा है। यह वही जिला है जहाँ तीन बड़े विकास प्राधिकरण, यूपीसीडा (UP State Industrial Development Authority), जिला प्रशासन, पुलिस कमिश्नरेट सब एक साथ मौजूद हैं। इसके बावजूद, विकास की रफ्तार से कहीं तेज़ी से यहाँ अवैध कॉलोनियों का जाल फैलता जा रहा है। औद्योगिक हब, मल्टीस्टोरी टाउनशिप और स्मार्ट सिटी की योजनाओं के समानांतर एक अवैध शहर चुपचाप बसता चला गया है।
यह कहना अब अतिशयोक्ति नहीं होगा कि गौतम बुद्ध नगर उत्तर प्रदेश में अवैध कॉलोनाइजेशन का सबसे तेज़ी से बढ़ता जिला बनता जा रहा है।
बरौला से गुलिस्तानपुर तक—हर तरफ अवैध कॉलोनियों की चुपचाप बाढ़
यदि पिछले डेढ़ दशक के आंकड़ों और ज़मीनी हकीकत पर नज़र डालें, तो तस्वीर डराने वाली है। नोएडा क्षेत्र में—बरौला, सदरपुर,भंगेल, सलारपुर, सरफाबाद, बहलोलपुर, इलाहाबास, नया गांव और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में—हैबतपुर, शाहबेरी, तुस्याना, सुनपुरा, वैदपुरा, सूरजपुर, कासना, चिटैहरा, गुलिस्तानपुर
जैसे दर्जनों गांवों में अवैध कॉलोनियों का संगठित नेटवर्क खड़ा हो चुका है। ये कॉलोनियाँ न तो किसी मास्टर प्लान का हिस्सा हैं, न ही इनके पास वैधानिक अनुमति है, फिर भी यहाँ हजारों लोग रहने को मजबूर हैं।
‘इंद्रलोकपुरम’—गुलिस्तानपुर में नया अवैध सपना या सुनियोजित जमीन घोटाला?
इन्हीं मामलों के बीच इन दिनों एक नया नाम तेज़ी से उभरकर सामने आया है— “इंद्रलोकपुरम” (Indralokpuram, Sector ZETA-1, Greater Noida)
प्रमोटर द्वारा जारी किए गए कथित ब्रोशर और सोशल मीडिया प्रचार में यह दावा किया जा रहा है कि—
यह प्रोजेक्ट सेक्टर ज़ीटा-1 में स्थित है
इसे ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की अनुमति प्राप्त है
यह निवेश के लिए “सुरक्षित और सुनहरा अवसर” है
लेकिन जब रफ़्तार टुडे की टीम ने इस प्रोजेक्ट की ज़मीनी सच्चाई की पड़ताल की, तो दावों की इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई।
हकीकत: सेक्टर ज़ीटा-1 नहीं, गुलिस्तानपुर की जमीन!
जांच में साफ़ हुआ कि “इंद्रलोकपुरम”— गुलिस्तानपुर गांव की भूमि पर विकसित किया जा रहा है। यह क्षेत्र UPSIDC की अधिसूचित औद्योगिक भूमि के बीच स्थित है यह इलाका ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिसूचित क्षेत्र में आता है सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि—
न इसका लेआउट किसी प्राधिकरण से स्वीकृत है
न कोई नक्शा पास कराया गया है
न RERA में पंजीकरण है
न जिला पंचायत या किसी अन्य विभाग से अनुमति
फिर भी प्लॉट काटे जा चुके हैं और बिक्री की पूरी तैयारी हो चुकी है।
ब्रिटिश कालीन सर्चलाइट स्तंभ और पुरातत्व भूमि पर अतिक्रमण की आशंका
गुलिस्तानपुर के ग्रामीणों में इस प्रोजेक्ट को लेकर एक और गंभीर चर्चा है। स्थानीय लोगों के अनुसार—इस भूमि के आसपास ब्रिटिश शासनकाल में स्थापित सर्चलाइट सिस्टम के अवशेष मौजूद हैं
एक पुराना सर्चलाइट स्तंभ आज भी खड़ा बताया जा रहा है
पूरे क्षेत्र में उस दौर में निगरानी व्यवस्था बनाई गई थी
ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि “इंद्रलोकपुरम” का विकास पुरातत्व महत्व की भूमि पर अतिक्रमण का मामला भी बन सकता है।
यदि यह पुष्टि होती है, तो मामला केवल अवैध कॉलोनी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह राष्ट्रीय धरोहर से छेड़छाड़ का गंभीर अपराध भी होगा।
अवैध कॉलोनियों में फंसे लोग—ना इधर के, ना उधर के
पिछले वर्षों में बनी अवैध कॉलोनियों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि— प्लॉट खरीदने के बाद लोग यहाँ फँस जाते हैं
सड़कें टूट चुकी होती हैं
सीवर लाइन नहीं होती
बरसात में जलभराव
बिजली-पानी की स्थायी समस्या
जब निवासी प्राधिकरण के पास जाते हैं, तो जवाब मिलता है “यह हमारी अधिकृत कॉलोनी नहीं है”
नतीजा—लोग सरकार को कोसते हैं, सिस्टम से निराश होते हैं और अंततः इसे अपनी किस्मत मान लेते हैं।
डेढ़ दशक में समानांतर शहर, कार्रवाई नाममात्र
पिछले 15 वर्षों में नोएडा-ग्रेटर नोएडा के समानांतर कई अवैध शहर बस चुके हैं। भूमाफिया और अवैध कॉलोनाइज़र यह काम संगठित अपराध की तरह योजनाबद्ध तरीके से अधिकारियों की नाक के नीचे करते रहे हैं।हैरानी की बात यह है कि इनके खिलाफ हुई कार्रवाई उंगलियों पर गिनने लायक भी नहीं है।
सवाल जो अब टाले नहीं जा सकते
अब सवाल साफ हैं—UPSIDC अपनी अधिसूचित भूमि की रक्षा क्यों नहीं कर पा रहा?
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की निगरानी व्यवस्था कहाँ फेल हुई?
जिला प्रशासन और पुलिस कमिश्नरेट को सूचना के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?
सोशल मीडिया पर चल रहे खुले विज्ञापनों पर रोक क्यों नहीं?
यदि अब भी चुप्पी बनी रही, तो यह चुप्पी सहमति मानी जाएगी।



