Fortis Hospital News : खेल का मैदान छोड़कर सर्जिकल ड्रामा, रीढ़ की नसों से चिपका था क्रिकेट बॉल जितना ट्यूमर, पैरालिसिस के बाद दोबारा चलने लगे सुबोध कुमार, फोर्टिस ने ‘रीढ़ की रस्सी’ पर खेला चमत्कार, सुबोध की जिंदगी को दी ‘पारालिसिस’ के जाल से मुक्ति!

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे।
44 वर्षीय सुबोध कुमार की ज़िंदगी एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई थी—एक क्रिकेट बॉल जितना बड़ा मायक्सॉइड रीढ़ का ट्यूमर जिसकी उपस्थिति उनके लिये मौत से जरा सी चूक पर खड़ी था। दो महीने की पैरालिसिस, मूत्र और मल पर नियंत्रण खोना—जिंदगी थम-सी गई थी। लेकिन फोर्टिस ग्रेटर नोएडा ने तकनीक, विज्ञान और मानवता का संगम करते हुए ऐसा ऑपरेशन किया कि सुबोध ने रफ्तार से खुद को फिर से पाया, व्हीलचेयर छोड़ी और स्टेडियम की स्टैंडिंग लाइन पर वापस खड़े हो गए।
रोग का नाम सुनने में आया ‘मायक्सॉइड मूल का दुर्लभ स्पाइनल ट्यूमर’। भारत में ऐसी स्थिति दुर्लभ, विशेषज्ञों को भी चौंका देने वाला।
श्रीखण्ड की तरह पतली रीढ़ में पनपा ‘खतरनाक अनजान’ ट्यूमर
जांच के दौरान पता चला कि ट्यूमर रीढ़ से सीने के मीडियास्टाइनम तक फैल चुका था, और स्पाइनल कॉर्ड को घेर रहा था—रोग का नाम सुनने में आया ‘मायक्सॉइड मूल का दुर्लभ स्पाइनल ट्यूमर’। भारत में ऐसी स्थिति दुर्लभ, विशेषज्ञों को भी चौंका देने वाला।
दर्द शुरू हुआ साधारण दिक्कत से, लेकिन तबाही ने लिए पैरालिसिस के रंग
पहले इसे स्लिप डिस्क या स्पाइनल टीबी बताया गया—इलाज चले, लेकिन जल्दी ही पैरालिसिस ने पकड़ ली। पेशाब और शौच तक नियंत्रण खत्म हुआ, जीवन परिवार पर निर्भर हो गया। “मैं कैथेटर से बंधा, व्हीलचेयर पर फंसा, हर काम दूसरों से करवाता…”—यह दर्द सुबोध की आवाज़ है।
फोर्टिस की ‘नेतृत्व वाली जंग’: टीम, तकनीक और उम्मीद का सूत्र
सर्जरी का नेतृत्व किया:
- डॉ. हिमांशु त्यागी (ऑर्थोपेडिक्स/स्पाइन सर्जरी प्रमुख)
- डॉ. राजेश मिश्रा, डॉ. मोहित शर्मा
तकनीक: - माइक्रोस्कोपिक सर्जरी
- इंट्रा-ऑपरेटिव न्यूरोमॉनीटरिंग
- इमेज-गाइडेंस सिस्टम
चार घंटे तक चलने वाली यह सर्जरी जिंदगी और मरण की रेखा तक जा पहुँची—हर इंच पर खून, समय और ध्यान का कड़ा मेल।
स्पाइनल कॉर्ड की चुप्पी से विद्रोह तक: ऑपरेशन का रोमांचक सफर
डॉ. त्यागी का कहना:
“ट्यूमर रीढ़ की नसों से चिपका था—हर कदम पर स्थायी पैरालिसिस, सीएसएफ लीक और फेफड़ों की जटिलता का खतरा था। लेकिन टीम ने न केवल ट्यूमर हटाया, बल्कि स्पाइनल कॉर्ड को संरक्षित किया।”
सुबोध की कहानी चिकित्सा जगत में ‘चमत्कार’ बनकर गूंज रही है। यह सफलता सिर्फ एक व्यक्ति की जंग नहीं, बल्कि लाखों को पैरालिसिस, डिसएबिलिटी या दते हुए जीवन से लडऍ की प्रेरणा दे रही है। रोग का नाम सुनने में आया ‘मायक्सॉइड मूल का दुर्लभ स्पाइनल ट्यूमर’। भारत में ऐसी स्थिति दुर्लभ, विशेषज्ञों को भी चौंका देने वाला।
चार महीने: व्हीलचेयर से सीढ़ी चढ़ने तक का आत्मीय सफर
- पहले ही महीने सुबोध ने बिना सहारे चलना शुरू किया।
- तीसरे महीने कैथेटर की जरूरत खत्म हुई।
- चौथे महीने उन्होंने न केवल घर के काम संभाले, बल्कि सीढ़ियाँ खुद चढ़े और बड़े आत्मबल से बोले—
“मैंने अपनी जिंदगी वापस पाई।”
जय हो जीवन को!
ट्यूमर के पीछे छुपा अनजान भूत – कारण बनें सुझाव
मायक्सॉइड स्पाइनल ट्यूमर का कारण साफ नहीं—मगर मुमकिन वजहें:
- Gene mutation
- पहली रेडिएशन थेरेपी
- Cell proliferation
आधुनिक चिकित्सा इसे ‘Idiopathic’ मानती है—कोई पक्का कारण नहीं, वंशानुगत भी नहीं।
एक ऑपरेशन, हजारों के लिए उम्मीद!
सुबोध की कहानी चिकित्सा जगत में ‘चमत्कार’ बनकर गूंज रही है। यह सफलता सिर्फ एक व्यक्ति की जंग नहीं, बल्कि लाखों को पैरालिसिस, डिसएबिलिटी या दते हुए जीवन से लडऍ की प्रेरणा दे रही है।
सुबोध की चुगुनी राहत, जीवन की नई राह
“जीवन खत्म हो गया था, लेकिन फोर्टिस ने मुझे फिर से मिलाया—मैं चल रहा हूँ, मेरी जिंदगी लौट आई।”
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