Breaking Greater Noida Authority News : गौर चौक FOB टेंडर में गड़बड़ी का खेल!, अदलखा की बालाजी कंपनी ने ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी को लगाया करोड़ों का चूना?, अधिकारी पल्ला झाड़ने में व्यस्त, गौर चौक का ‘FOB टेंडर’ बना चर्चा का केंद्र, अदलखा की बालाजी कंपनी के खेल से ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी सकते में!, FOB या ‘फायदे का ओवर ब्रिज’? — जांच की मांग तेज़

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे। शहर के व्यस्ततम गौर चौक, एक मूर्ति पर पैदल यात्रियों की सुविधा के लिए प्रस्तावित FOB (Foot Over Bridge) परियोजना अब एक विवाद और जांच का विषय बन गई है। जानकारी के मुताबिक, अदलखा की बालाजी कंपनी को यह टेंडर मिला था, लेकिन टेंडर मिलने के बाद जिस तरह से विज्ञापन यूनिपोल आवंटन की मांग और स्वीकृति हुई, उसने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
टेंडर मिला, एप्लीकेशन लगी और शुरू हुआ ‘यूनिपोल का खेल’
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, अदलखा की बालाजी कंपनी ने गौर चौक पर FOB का टेंडर प्राप्त करने के बाद प्राधिकरण में एक एप्लीकेशन लगाई, जिसमें दावा किया गया कि “हमें FOB पर 4 विज्ञापन मिले थे, जिनमें से केवल 3 ही विज़िबल हैं। अतः हमें प्राधिकरण से दो_दो यूनिपोल (40×20 फीट) का अतिरिक्त विज्ञापन स्पेस दिया जाए।”
अचरज की बात यह रही कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने बिना कोई तकनीकी या कानूनी जांच किए, कंपनी की मांग को मंजूरी दे दी और एक यूनिपोल आवंटित भी कर दिया। यानी कि सरकारी संपत्ति का उपयोग एक प्राइवेट लाभ के लिए कर दिया गया — वह भी बिना किसी टेंडर या पब्लिक ट्रांसपेरेंसी के।
प्राधिकरण के अर्बन विभाग से जब पूछा गया तो ‘पल्ला झाड़ने’ की होड़ वर्क सर्कल 7 में पल्ला झाड़
रफ़्तार टुडे ने जब इस मामले पर ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अर्बन विभाग से जवाब मांगा तो वहां से साफ कहा गया कि “गौर चौक वर्क सर्कल-7 के अंतर्गत आता है, इसलिए यह मामला हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है।”
इसके बाद जब वर्क सर्कल-7 के प्रभारी अधिकारी निरोत्तम चौधरी से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा “मेरे पास यह फाइल आई थी, और मैंने फाइल के अनुसार ही कार्य किया है। यदि किसी को शिकायत है तो वह लिखित में दें, मैं जांच कराऊँगा।”
इस तरह, दोनों विभागों के अधिकारी ‘मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं’ और ‘फाइल के अनुसार काम किया’ जैसे जवाब देकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते दिखाई दिए।
FOB या ‘फायदे का ओवर ब्रिज’? — जांच की मांग तेज़
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि इस पूरे मामले में कंपनी और कुछ विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
मामला यह है कि टेंडर केवल FOB निर्माण के लिए था, लेकिन कंपनी ने इसे विज्ञापन के माध्यम से राजस्व उत्पन्न करने के साधन में बदल दिया।
इसके एवज में यूनिपोल का आवंटन — यानी सरकारी जमीन पर विज्ञापन का फायदा उठाना — सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्राधिकरण ने बिना किसी ऑडिट या जांच के यह अनुमति दी?
अगर ऐसा है, तो यह राजस्व हानि का स्पष्ट मामला बन सकता है।
क्या CEO NG एनजी रवि कुमार करेंगे एक्शन या मामला फिर ‘ठंडे बस्ते’ में जाएगा?
अब सबकी निगाहें सीओ (सर्कल ऑफिसर) एनजी रवि कुमार पर टिकी हैं, जो फिलहाल इस पूरे प्रकरण की निगरानी कर रहे हैं।
स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि “यह मामला केवल विज्ञापन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता का है। अगर इस पर कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में और भी कंपनियाँ इसी तरह के खेल खेलेंगी।”
यह देखना दिलचस्प होगा कि सीओ NG रवि कुमार इस फाइल पर कितनी गंभीरता दिखाते हैं या फिर यह मामला भी ब्यूरोक्रेटिक बहानेबाज़ी की भेंट चढ़ जाता है।
रफ़्तार टुडे की पड़ताल — कैसे चलता है ‘टेंडर से यूनिपोल’ तक का नेटवर्क
रफ़्तार टुडे की प्राथमिक जांच में यह सामने आया है कि शहर के कई बड़े जंक्शन, खासकर जहां FOB या सरकारी निर्माण कार्य होते हैं, वहां विज्ञापन अधिकारों का यह खेल लगातार चल रहा है। अक्सर कंपनियां निर्माण का टेंडर जीतने के बाद ‘विज़िबिलिटी लॉस’ या ‘प्रचार लाभ’ के नाम पर अतिरिक्त यूनिपोल या होर्डिंग्स की अनुमति मांगती हैं। अफसरों की मिलीभगत से ये मांगें मंजूर भी हो जाती हैं।
इन विज्ञापन स्थलों से कंपनियों को लाखों रुपये का मासिक लाभ होता है, जबकि प्राधिकरण को शून्य राजस्व मिलता है।
ऐसे में यह पूरा सिस्टम ‘बिजनेस फॉर बेनिफिट ऑफ अ few’ बन गया है — यानी आम जनता के कर के पैसे पर कुछ लोगों का निजी मुनाफा।
जवाबदेही तय होनी चाहिए — शहर के विकास के नाम पर बंदरबांट नहीं!
गौर चौक जैसे प्रमुख स्थान पर FOB निर्माण का उद्देश्य जनता की सुविधा थी, लेकिन अगर यह प्रोजेक्ट कंपनी के निजी लाभ का जरिया बन गया है, तो यह शहर और शासन दोनों के लिए चिंता का विषय है। अधिकारी पल्ला झाड़ लें, मगर सवाल यह है कि प्राधिकरण की अनुमति आखिर किस आधार पर दी गई?
क्या यह निर्णय बोर्ड मीटिंग में पारित हुआ था?
क्या किसी स्वतंत्र मूल्यांकन या निरीक्षण की रिपोर्ट उपलब्ध है? अगर नहीं, तो यह साफ तौर पर गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार का मामला है।
स्थानीय जनता और रफ़्तार टुडे की मांग — निष्पक्ष जांच हो
स्थानीय लोगों ने सीएम योगी आदित्यनाथ, मुख्य सचिव (औद्योगिक विकास) और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के सीईओ से मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। रफ़्तार टुडे भी यह सवाल उठाता है कि “क्या कोई भी ठेकेदार अब विकास कार्यों के बहाने सरकारी जमीनों पर विज्ञापन अधिकार हासिल कर सकता है?”
यदि यह जांच पारदर्शी तरीके से होती है, तो यह भविष्य में इस तरह की अवैध यूनिपोल डील्स को रोकने में सहायक होगी।
‘FOB’ को ‘Free Of Brains’ न बनने दें!
गौर चौक का मामला यह याद दिलाता है कि विकास परियोजनाएं अगर निगरानी और पारदर्शिता से वंचित हो जाएं, तो वे भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाती हैं। अब यह देखना बाकी है कि सीओ एनजी रवि कुमार और प्राधिकरण के उच्च अधिकारी इस पर संज्ञान लेते हैं या नहीं।
जनता जवाब चाहती है — “FOB बना या ‘फायदे का ब्रिज’?”



