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Yatharth Hospital SCAM News : "अस्पताल या मौत का सौदागर?", यथार्थ हॉस्पिटल पर गंभीर आरोप, सोशल मीडिया पर मचा बवाल, ग्रेटर नोएडा के नागरिकों में आक्रोश, परिजनों ने लगाई इंसाफ की गुहार; DM और CMO से जांच की मांग, FB Twiiiter, Whatsapp पर वायरल


ग्रेटर नोएडा | विशेष रिपोर्ट – रफ्तार टुडे


जब इलाज के नाम पर छिन गई ज़िंदगी

ग्रेटर नोएडा के प्रतिष्ठित माने जाने वाले यथार्थ हॉस्पिटल को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त नाराजगी देखने को मिल रही है। आरोप हैं कि यह अस्पताल अब सिर्फ इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि “मुनाफाखोरी का अड्डा” बन चुका है — जहां मरीजों के इलाज से ज़्यादा उनके परिजनों की भावनाओं और मजबूरियों को भुनाया जाता है।

इस पूरे मामले की शुरुआत हुई एक फेसबुक पोस्ट से, जिसे सुरेंद्र शर्मा नामक व्यक्ति ने साझा किया। उन्होंने अपने अनुभव में लिखा:

“मैं एक बेटे के रूप में यथार्थ अस्पताल की सच्चाई सबके सामने रखना चाहता हूँ। मेरे पिता को 26 फरवरी 2025 को हल्की थकान और कमजोरी महसूस हुई। उन्हें गंभीर कोई बीमारी कभी नहीं थी। हमने उन्हें एहतियातन यथार्थ हॉस्पिटल ले जाया, जहाँ बताया गया कि ऑक्सीजन थोड़ा कम है। कुछ ही घंटों में ICU, फिर वेंटिलेटर और फिर मृत्यु…”


इलाज या व्यापार? इलाज से पहले बिल, डर दिखाकर वसूली

सुरेंद्र के अनुसार, उनके पिता को वेंटिलेटर पर रखने और इलाज के लिए महज़ चार घंटे में ₹2.4 लाख का बिल बना दिया गया, वो भी तब जब किसी ऑपरेशन या विशेष इमरजेंसी प्रक्रिया का कोई उल्लेख नहीं था।

उन्होंने दावा किया:

“जब हमने किसी अन्य हॉस्पिटल (Jaypee या AIIMS) में रेफर करने की बात कही, तो डॉक्टरों ने कहा कि शिफ्ट करने पर जान जा सकती है। सवाल ये है — क्या उन्हें इसी हॉस्पिटल ने वेंटिलेटर तक पहुंचाया?”


सोशल मीडिया पर उठा तूफ़ान: लोग बोले – “ये हॉस्पिटल नहीं, लूट का अड्डा है”

सुरेंद्र की पोस्ट पर सैकड़ों प्रतिक्रियाएं आईं। कई अन्य लोगों ने भी यथार्थ हॉस्पिटल को लेकर अपने नकारात्मक अनुभव साझा किए।

  • रीमा अवस्थी लिखती हैं: “मेरे अंकल को मामूली डिहाइड्रेशन था, लेकिन ICU में डालकर ₹1.8 लाख का बिल बना दिया गया।”
  • अंकित नागर ने कहा: “यहाँ इलाज नहीं, डर बेचा जाता है।”

सोशल मीडिया पर #YatharthLootHospital, #JusticeForPatients, #HealthcareOrScam जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।


प्रशासन से जांच की मांग, DM और CMO को टैग कर लिखी गई शिकायतें

इस पोस्ट के वायरल होते ही कई नागरिकों और सामाजिक संस्थाओं ने DM गौतम बुद्ध नगर और CMO को टैग करते हुए जांच की मांग की।
आवाज उठाई गई कि:

  • पूरे प्रकरण की स्वतंत्र मेडिकल ऑडिट कराई जाए
  • मरीजों की क्लिनिकल हिस्ट्री व ICU में भर्ती की परिस्थितियों की पड़ताल हो
  • हॉस्पिटल के खिलाफ अगर मेडिकल नेग्लिजेंस और अत्यधिक बिलिंग के साक्ष्य मिलें तो एनओसी और लाइसेंस की समीक्षा की जाए

अस्पताल की प्रतिक्रिया पर अब तक सस्पेंस

फिलहाल यथार्थ हॉस्पिटल प्रबंधन की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। ना ही सोशल मीडिया पोस्ट का खंडन किया गया और ना ही पीड़ित परिजनों से संपर्क की पुष्टि हो पाई है।

रफ्तार टुडे ने इस विषय पर हॉस्पिटल प्रबंधन को आधिकारिक प्रतिक्रिया देने के लिए ईमेल किया है। जवाब मिलने पर अपडेट प्रकाशित किया जाएगा।


क्या मेडिकल संस्थान अब “कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी” के केंद्र बनते जा रहे हैं?

यह घटना एक बहुत बड़े प्रश्न को जन्म देती है:

“क्या निजी अस्पताल अब इलाज से अधिक ‘डर के व्यापार’ में लगे हैं?”

मेडिकल सेक्टर में प्राइवेट हॉस्पिटल्स का बड़ा योगदान होने के बावजूद, जब ऐसे मामले सामने आते हैं — तो आम जनता का भरोसा डगमगाने लगता है।


विशेषज्ञों की राय – “मेडिकल ऑडिट जरूरी, लेकिन कानून भी सख्त हो”

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. नलिन मिश्रा का कहना है:

“ऐसे मामलों में मेडिकल ऑडिट के साथ-साथ, मेडिकल एथिक्स बोर्ड को हस्तक्षेप करना चाहिए। अगर हॉस्पिटल में डर दिखाकर भर्ती और बिलिंग की परंपरा है, तो वह साफतौर पर ‘एब्यूस ऑफ मेडिकल प्रैक्टिस’ की श्रेणी में आता है।”


सिर्फ यथार्थ ही नहीं, और भी कई अस्पतालों पर ऐसे आरोप

यह पहला मामला नहीं है जब ग्रेटर नोएडा के किसी निजी अस्पताल पर गंभीर लापरवाही या अनावश्यक बिलिंग का आरोप लगा हो।

पिछले वर्ष भी एक अस्पताल पर एक्स-रे और ब्लड टेस्ट में हेरफेर कर मरीज को ICU में डालने का मामला सामने आया था। लेकिन दबाव, पहुंच और संपर्कों के चलते ऐसे मामले अक्सर ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।


आम नागरिकों से अपील — जागरूक रहें, सवाल पूछें, दस्तावेज रखें

  • इलाज से पहले डॉक्टर से हर टेस्ट और प्रक्रिया का कारण पूछें
  • सभी बिलिंग दस्तावेजों की कॉपी सुरक्षित रखें
  • यदि कोई अनावश्यक दबाव महसूस हो तो CMO या हेल्थ मिनिस्ट्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें
  • RTI और आरटीआई मेडिकल रिकॉर्ड जैसे अधिकारों का प्रयोग करें

क्या मिलेगा इंसाफ? या फिर एक और मामला भुला दिया जाएगा?

सवाल यह नहीं कि केवल एक मरीज की मौत हुई, सवाल यह है कि क्या एक स्वस्थ व्यक्ति को बिना ज़रूरत ICU और वेंटिलेटर तक क्यों ले जाया गया?

क्या भविष्य में कोई और बेटा, अपनी माँ या पिता को महंगे बिल और खोई हुई जान के बीच तड़पता देखेगा?


रफ्तार टुडे की अपील:

यदि आपके पास भी ऐसे किसी मामले से जुड़े दस्तावेज़, अनुभव या तथ्य हों — तो हमें [RaftarToday@gmail.com] पर लिखें। हम हर पीड़ित की आवाज़ को प्रशासन तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।


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रिपोर्ट: रफ्तार टुडे इन्वेस्टिगेटिव टीम, ग्रेटर नोएडा
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