Breaking News : “एक घंटे की बारिश, सात साल का इंतज़ार और हर बार वही डूबा अंडरपास!”, पैरामाउंट गोल्फफॉरेस्ट, दादरी और ग्रेटर नोएडा वेस्ट के पास अधूरा प्रोजेक्ट बना जनजीवन पर ‘जल-जाम’, जिम्मेदार कौन?, जिम्मेदारी का खेल एजेंसी, प्राधिकरण और विभागों में टकराव

ग्रेटर नोएडा वेस्ट/दादरी, रफ़्तार टूडे। शहर के विकास की रफ्तार जितनी तेज़ दिखाई जाती है, ज़मीनी हकीकत कई बार उतनी ही धीमी और परेशान करने वाली होती है। इसका ताज़ा उदाहरण पैरामाउंट गोल्फफॉरेस्ट के पास बन रहा अंडरपास है, जो पिछले 6–7 वर्षों से अधूरा पड़ा हुआ है और हर बारिश में स्थानीय लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन जाता है। बीती रात महज एक घंटे की बारिश ने इस अंडरपास की हकीकत फिर से उजागर कर दी—पूरा अंडरपास पानी में डूब गया और हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका सीधा असर पड़ा।
बारिश आई, अंडरपास डूबा—रोजमर्रा की जिंदगी हुई ठप
रात में हुई हल्की लेकिन तेज़ बारिश के बाद सुबह जब लोग अपने काम पर निकलने लगे तो अंडरपास पूरी तरह जलमग्न मिला। दादरी, ग्रेटर नोएडा वेस्ट और आसपास के क्षेत्रों को जोड़ने वाला यह मार्ग अचानक ट्रैफिक जाम और पानी के दलदल में बदल गया। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर ऑफिस जाने वाले कर्मचारियों तक, हर किसी को लंबा चक्कर लगाकर अपने गंतव्य तक पहुंचना पड़ा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि हर साल मानसून या हल्की बारिश में भी यही हाल देखने को मिलता है। सवाल यह है कि जब समस्या वर्षों से बनी हुई है, तो अब तक इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला गया?
“हर साल वही कहानी, कब तक झेलें?”—निवासियों का फूटा गुस्सा
पैरामाउंट गोल्फफॉरेस्ट के निवासी दीपक त्यागी ने नाराजगी जताते हुए कहा कि यह परियोजना अब विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि लोगों के लिए सिरदर्द बन चुकी है। उनके अनुसार, “सात साल से यह प्रोजेक्ट अधूरा है और हर बारिश में हालात बदतर हो जाते हैं। अब लोग चुप नहीं बैठेंगे, विरोध करना पड़े तो वह भी करेंगे।”
वहीं, अशोक चौधरी ने भी प्रशासन और निर्माण एजेंसियों पर सवाल उठाते हुए कहा, “हर साल एक ही समस्या दोहराई जाती है। सुबह बच्चों के स्कूल का समय खराब होता है और ऑफिस जाने वाले लोग घंटों जाम में फंसते हैं। आखिर कब तक लोग यह सब सहते रहेंगे?”
चेतावनी के सुर: “अब विरोध तय है”
दादरी निवासी ललित शर्मा ने साफ शब्दों में कहा कि अगर जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो लोग सड़क पर उतरने को मजबूर होंगे। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अंडरपास में लगातार जलभराव की समस्या बनी रही तो क्षेत्र में चल रही अन्य परियोजनाओं, खासकर फ्रेट ट्रेन संचालन को लेकर भी विरोध किया जा सकता है।
यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि अब लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है और यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो यह मुद्दा बड़ा जनआंदोलन बन सकता है।
पंप हटे, समस्या बढ़ी—जल निकासी व्यवस्था पर सवाल
स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया है कि पहले अंडरपास में पानी निकालने के लिए जो पंप लगाए गए थे, उन्हें हटा दिया गया है। इसके कारण पानी की निकासी पूरी तरह ठप हो गई है और थोड़ी सी बारिश में भी पानी भर जाता है।
यह लापरवाही सीधे तौर पर प्रशासनिक चूक की ओर इशारा करती है, क्योंकि किसी भी अंडरपास के निर्माण में ड्रेनेज सिस्टम सबसे अहम भूमिका निभाता है।
जिम्मेदारी का खेल: एजेंसी, प्राधिकरण और विभागों में टकराव
इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिम्मेदारी तय करने के बजाय एजेंसियां एक-दूसरे पर आरोप मढ़ रही हैं। निर्माण एजेंसी Larsen & Toubro (एलएंडटी) के प्रतिनिधि पी.के. गुहा ने स्पष्ट जवाब देने से बचते हुए कहा कि इस विषय पर जानकारी प्रोजेक्ट टीम ही दे सकती है। उन्होंने प्रोजेक्ट मैनेजर का संपर्क देने से भी इनकार कर दिया।
दूसरी ओर, प्राधिकरण के मैनेजर प्रभात शंकर ने कहा कि यह काम Dedicated Freight Corridor Corporation of India Limited (DFCIL) और एलएंडटी का है, और प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद ही प्राधिकरण की जिम्मेदारी तय होगी। इस तरह की बयानबाजी से साफ है कि आम जनता की समस्या के बीच जिम्मेदार संस्थाएं जवाबदेही से बच रही हैं।
विकास बनाम वास्तविकता: अधूरे प्रोजेक्ट्स की कीमत जनता चुका रही
पैरामाउंट गोल्फफॉरेस्ट अंडरपास का मामला केवल एक निर्माण परियोजना की देरी नहीं है, बल्कि यह उस प्रणालीगत समस्या का उदाहरण है, जहां योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन समय पर और सही तरीके से नहीं हो पाता। अधूरे प्रोजेक्ट्स, कमजोर ड्रेनेज सिस्टम और समन्वय की कमी—ये तीनों मिलकर आम नागरिकों के लिए रोजाना परेशानी का कारण बनते हैं।
क्या मिलेगा समाधान या फिर अगली बारिश का इंतजार?
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या संबंधित एजेंसियां और प्राधिकरण इस समस्या का स्थायी समाधान निकालेंगे, या फिर हर साल की तरह अगली बारिश का इंतजार किया जाएगा, जब फिर यही तस्वीर दोहराई जाएगी।
स्थानीय लोग अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस कार्रवाई चाहते हैं।



