Greater Noida Authority News : 15 साल बाद टूटी उम्मीदों की चुप्पी, अब मिलेगा न्याय का उजाला, 151 किसानों की आबादी बैकलीज को मिली एसआईटी से हरी झंडी, शासन से अंतिम मुहर का इंतज़ार, 2007 से 2012 तक की कहानी, अधिग्रहण के बाद अधूरा वादा

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे।
ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के हजारों किसानों के चेहरों पर अब न्याय की उम्मीद की रौशनी दिखाई देने लगी है। बीते 15 वर्षों से अपनी आबादी बैकलीज (Residential Backlease) के लिए संघर्ष कर रहे 151 किसानों को आखिरकार बड़ी राहत मिली है। शासन द्वारा गठित विशेष जांच टीम (SIT) ने इन प्रकरणों की जांच पूरी कर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी है। अब बस एक अंतिम प्रशासनिक स्वीकृति का इंतज़ार है, जिसके बाद इन किसानों को उनका कानूनी हक़ – जमीन की बैकलीज – मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा।
2007 से 2012 तक की कहानी: अधिग्रहण के बाद अधूरा वादा
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण और यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) द्वारा 2007 से 2012 के बीच विभिन्न परियोजनाओं के लिए हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी। अधिग्रहण के समय, किसानों को मुआवजे के अलावा उनकी ही आबादी की जमीन पर बैकलीज देने का वादा किया गया था, ताकि वे अपने परिवार के लिए आवास बना सकें और सामाजिक रूप से सुरक्षित रह सकें।
हालांकि, इन वादों में से सैकड़ों को समय पर पूरा किया गया, लेकिन 151 ऐसे प्रकरण सामने आए जहां या तो बैकलीज नहीं दी गई या कागजी विवादों में उलझा दी गई। किसानों ने कई बार ज्ञापन, धरने और प्रदर्शन किए, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा।
एसआईटी गठित, गहन जांच हुई शुरू
इन लंबित मामलों में कथित अनियमितताओं की शिकायतों के चलते यूपी शासन ने यमुना प्राधिकरण के पूर्व सीईओ डॉ. अरुणवीर सिंह की अध्यक्षता में एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित की। इस टीम को 151 प्रकरणों की गहराई से जांच करने का निर्देश दिया गया।
SIT की प्रक्रिया बेहद पारदर्शी और तथ्य आधारित रही। जांच के दौरान प्राधिकरण के भूलेख विभाग ने सभी जरूरी दस्तावेज – जैसे जमीन की खतौनी, अधिग्रहण के आदेश, पुरानी फाइलें, नक्शे और किसानों के बयान – पेश किए। टीम ने कई मामलों में मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन भी किया।
151 में से सभी प्रकरण सही पाए गए
जांच के दौरान SIT ने यह पाया कि जिन 151 किसानों को बैकलीज नहीं मिली थी, उनकी मांग जायज़ थी और वे नियमों के अनुसार पात्र थे। इसमें किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा या दस्तावेजी अनियमितता नहीं पाई गई।
अब SIT ने अपनी अंतिम रिपोर्ट शासन को सौंप दी है और उम्मीद की जा रही है कि कुछ ही हफ्तों में शासन से मंजूरी मिलने के बाद बैकलीज प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
किसानों में खुशी की लहर, बोले – संघर्ष रंग लाया
15 वर्षों से अपनी ज़मीन के अधिकार के लिए लड़ते हुए थक चुके किसान अब खुशी और राहत की सांस ले रहे हैं।
दादरी, जेवर, रबूपुरा, सिरसा, डाढ़ा, बिसरख, लुक्सर जैसे गांवों के किसानों ने इस पर खुशी जताई।
किसान नेता सुरेंद्र ने रफ्तार टुडे से कहा –
“हमने अपनी ज़मीनें विकास के लिए दीं थीं, लेकिन हमें खुद रहने की जमीन नहीं मिली। अब जाकर लगता है कि सरकार हमारी आवाज़ सुन रही है। यह केवल 151 परिवारों की जीत नहीं, बल्कि पूरे किसान समाज की जीत है।”
क्या है बैकलीज और क्यों है जरूरी?
- बैकलीज का मतलब है कि अधिग्रहित जमीन का एक हिस्सा (आबादी क्षेत्र) किसानों को आवासीय उपयोग के लिए वापस दिया जाए।
- यह किसानों के आवास, आजीविका और सामाजिक सम्मान से जुड़ा सवाल होता है।
- बैकलीज मिलने से किसान मकान बना सकते हैं, लोन ले सकते हैं, संपत्ति बेच या किराए पर दे सकते हैं।
न्याय से विकास का संतुलन
इस मामले में शासन की पहल यह साबित करती है कि विकास तभी सफल है जब वह सामाजिक न्याय और पारदर्शिता के साथ किया जाए। बैकलीज प्रकरणों की पुनर्समीक्षा ने यह दिखा दिया है कि देर भले हो, पर न्याय मिल सकता है।
अब आगे क्या? शासन से स्वीकृति का इंतजार
- एसआईटी रिपोर्ट शासन के पास भेजी जा चुकी है।
- रिपोर्ट पर मंजूरी मिलते ही ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण 151 किसानों को बैकलीज देने की प्रक्रिया शुरू करेगा।
- इसके बाद उन किसानों को आबादी पट्टा (Residential Lease Deed) जारी किया जाएगा।
- यह पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल बनेगा।
यह रिपोर्ट क्यों है महत्वपूर्ण?
- पहली बार इतने बड़े बैकलीज विवाद पर उच्च स्तरीय जांच पूरी हुई है।
- 151 मामलों में सभी पात्र पाए गए, कोई गड़बड़ी नहीं मिली।
- इससे भविष्य में भी किसानों की बैकलीज प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष रूप देने में मदद मिलेगी।
निष्कर्ष: उम्मीद की किरण बनी एसआईटी रिपोर्ट, शासन के फैसले से बदलेगी सैकड़ों परिवारों की ज़िंदगी
15 साल का इंतजार, संघर्ष और सिस्टम की दीवारें – इन सभी को पार कर अब आखिरकार किसान अपने आवासीय हक के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। एसआईटी रिपोर्ट इस दिशा में मील का पत्थर साबित हुई है। अब यदि शासन समय रहते फैसला करता है, तो यह ग्रेटर नोएडा के इतिहास में किसानों के पक्ष में लिया गया सबसे संवेदनशील और सकारात्मक निर्णय माना जाएगा।
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✍️ रिपोर्ट: रफ्तार टुडे ब्यूरो, ग्रेटर नोएडा
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