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YEIDA Board Meeting News : फाइलों में फर्राटा, ज़मीन पर ब्रेक!, YEIDA की 88वीं बोर्ड बैठक में औद्योगिक विकास के बड़े फैसले, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अब भी सवालों के घेरे में, निवेश, औद्योगिक पार्क और शिक्षा–हेरिटेज सिटी पर बड़े फैसले, वन टाइम सेटलमेंट पॉलिसी राहत या फिर नई उलझन?, सेक्टर-वार प्रगति कहीं भीड़, कहीं सन्नाटा

ग्रेटर नोएडा / यमुना एक्सप्रेसवे, रफ़्तार टूडे। यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) की 88वीं बोर्ड बैठक, जो 30 जनवरी 2026 को आयोजित हुई, कागज़ों पर विकास की एक लंबी और प्रभावशाली तस्वीर पेश करती है। बैठक में औद्योगिक भूखंडों के आवंटन, लीज डीड निष्पादन, निर्माण स्वीकृति, एकमुश्त समाधान योजना (OTS) और सेक्टर-वार प्रगति जैसे कई अहम बिंदुओं पर बड़े निर्णय लिए गए।
लेकिन सवाल यही है क्या यह विकास सिर्फ फाइलों तक सीमित है या सचमुच ज़मीन पर उतर रहा है?
क्या निवेशक और आम नागरिक इस “रफ्तार” को महसूस कर पा रहे हैं, या फिर यह भी बीते वर्षों की तरह आंकड़ों और प्रेस नोट्स तक सिमट कर रह जाएगी?


औद्योगिक विकास के बड़े दावे, आंकड़ों की लंबी फेहरिस्त
YEIDA द्वारा जारी प्रेस नोट के मुताबिक, प्राधिकरण क्षेत्र के विभिन्न सेक्टरों में हजारों औद्योगिक भूखंडों की स्थिति की गहन समीक्षा की गई। बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत आंकड़े यह दर्शाते हैं कि सैकड़ों औद्योगिक भूखंडों पर लीज प्लान प्राप्त हो चुके हैं
बड़ी संख्या में मामलों में चेकलिस्ट जारी की गई है
कई सेक्टरों में लीज डीड निष्पादित होने का दावा किया गया
कुछ भूखंडों पर पजेशन देकर निर्माण कार्य शुरू होने की जानकारी भी दी गई
प्राधिकरण का दावा है कि इन निर्णयों से यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र को उत्तर भारत का एक बड़ा औद्योगिक हब बनाने की दिशा में ठोस आधार तैयार हो रहा है। निवेश को बढ़ावा मिलेगा, रोजगार के अवसर सृजित होंगे और राजस्व में भी इज़ाफा होगा।


वन टाइम सेटलमेंट पॉलिसी: राहत या फिर नई उलझन?
88वीं बोर्ड बैठक में One Time Settlement Policy (OTS) 2025-26 को भी प्रमुखता से रखा गया। इस नीति के तहत लंबे समय से डिफॉल्टर चल रहे औद्योगिक और अन्य श्रेणी के आवंटियों को बकाया जमा कर भूखंड नियमित कराने का मौका दिया जा रहा है।
YEIDA के अनुसार इस नीति से वर्षों से अटके मामलों का निस्तारण होगा
प्राधिकरण को करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त होगा
बंद या अधूरे पड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को नई रफ्तार मिलेगी
हालांकि, ज़मीनी हकीकत इससे थोड़ी अलग नज़र आती है। कई निवेशकों का कहना है कि नीति कागज़ पर अच्छी है, लेकिन प्रक्रियाएं जटिल हैं
फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल घूमती रहती हैं
स्पष्ट टाइमलाइन का अब भी अभाव है
निवेशकों की चिंता यह है कि OTS का लाभ लेने के बाद भी यदि निर्माण स्वीकृति या अन्य विभागीय मंज़ूरियों में देरी हुई, तो फायदा अधूरा रह जाएगा।

सेक्टर-वार प्रगति: कहीं भीड़, कहीं सन्नाटा
प्रेस नोट में अलग-अलग सेक्टरों की स्थिति को आंकड़ों के ज़रिये दर्शाया गया है। कहीं सैकड़ों भूखंड आवंटित दिखते हैं, तो कहीं बड़ी संख्या में प्लॉट अब भी खाली पड़े हैं।
कई सेक्टरों में स्थिति यह है कि—
आवंटन हो चुका है
लीज डीड अब तक लंबित है
निर्माण स्वीकृति नहीं मिली
या फिर सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। यही वजह है कि औद्योगिक विकास के तमाम दावों के बावजूद ग्राउंड लेवल पर फैक्ट्रियों की चिमनियां कम और बोर्ड ज्यादा दिखाई देते हैं।


फाइलों से आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा विकास?
YEIDA की योजनाओं की सबसे बड़ी चुनौती क्रियान्वयन मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि—
निर्णय तो लिए जाते हैं
लेकिन उनकी नियमित मॉनिटरिंग नहीं होती
जिम्मेदारी तय नहीं होने से फाइलें अटक जाती हैं
यही कारण है कि कई परियोजनाएं 5-10 साल बाद भी कागज़ों में जीवित और ज़मीन पर निष्क्रिय दिखाई देती हैं।

आवासीय इलाकों की पीड़ा: विकास का दूसरा चेहरा
जहां एक ओर औद्योगिक विकास के आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रेटर नोएडा वेस्ट और आसपास के आवासीय क्षेत्रों में हालात अलग कहानी बयान करते हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है सड़कें टूटी हुई हैं
बरसात में जलभराव आम है
धूल और ट्रैफिक से लोग परेशान हैं
बिजली और पानी की समस्या अब भी जस की तस है
लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब उद्योगों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर पर इतनी योजनाएं बन सकती हैं, तो आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतें प्राथमिकता में क्यों नहीं?


निवेशक बनाम निवासी: किसे मिलेगा विकास का फायदा?
YEIDA के फैसले यह संकेत जरूर देते हैं कि प्राधिकरण निवेश और राजस्व को लेकर गंभीर है, लेकिन—
आम नागरिक अब भी विकास को महसूस नहीं कर पा रहा
निवेशक स्पष्ट टाइमलाइन के इंतज़ार में हैं
कई आवंटी वर्षों से दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं
यह स्थिति विकास के मॉडल पर सवाल खड़े करती है, जहां आंकड़े आगे हैं, लेकिन अनुभव पीछे।

विशेषज्ञों की राय: जवाबदेही ही असली कुंजी
शहरी विकास से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि हर फैसले की समयबद्ध मॉनिटरिंग हो
सेक्टर-वार जिम्मेदार अधिकारी तय हों
और देरी पर जवाबदेही सुनिश्चित की जाए
तो YEIDA क्षेत्र का औद्योगिक और आवासीय विकास वास्तव में ज़मीन पर दिखाई दे सकता है।


अब निगाह अमल पर
88वीं बोर्ड बैठक में लिए गए फैसले भविष्य की दिशा तो तय करते हैं, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है।
क्या समय से निर्माण शुरू होगा?
क्या निवेशकों को दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे?
क्या आवासीय क्षेत्रों को भी वही प्राथमिकता मिलेगी जो उद्योगों को? इन सवालों के जवाब आने वाला वक्त देगा। फिलहाल इतना तय है कि YEIDA के विकास की कहानी अब फाइलों से निकलकर सड़क, फैक्ट्री और कॉलोनियों तक पहुंचने की मांग कर रही है।

प्राधिकरण की मंशा बनाम ज़मीनी सच्चाई
YEIDA बोर्ड बैठक के फैसले यह संकेत देते हैं कि प्राधिकरण निवेश, राजस्व और औद्योगिक विस्तार को लेकर गंभीर है। लेकिन यह भी सच है कि कई परियोजनाएं वर्षों से कागजों में अटकी हैं
निवेशक अब भी स्पष्ट टाइमलाइन का इंतज़ार कर रहे हैं
आम जनता विकास को महसूस नहीं कर पा रही
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निर्णयों के साथ-साथ मॉनिटरिंग और जवाबदेही तय की जाए, तो विकास का असर ज़मीनी स्तर पर भी दिख सकता है।

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Raftar Today
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