Greater Noida News : “शिक्षा पर ताला नहीं चलेगा सरकार!”, 27,000 स्कूल बंद करने के फैसले पर भड़की आम आदमी पार्टी, बताया शिक्षा के मौलिक अधिकार का हनन, स्कूलों का नहीं, व्यवस्था का युग्मन हो!’

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कम छात्र संख्या वाले लगभग 27,000 परिषदीय स्कूलों को बंद करने के निर्णय को लेकर राजनीतिक हलकों में तूफान मच गया है। आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस फैसले को जनविरोधी, संवेदनहीन और शिक्षा विरोधी नीति करार देते हुए इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया है। पार्टी ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर यह निर्णय वापस नहीं लिया गया, तो पूरे प्रदेश में वृहद जनआंदोलन छेड़ा जाएगा।
सरकार के फैसले पर विपक्ष का कड़ा हमला: ‘ये शिक्षा का वध है, सुधार नहीं!’
आम आदमी पार्टी किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष कमांडो अशोक ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि:
“एक ओर सरकार ‘हर बच्चे को शिक्षा’ का नारा देती है, और दूसरी ओर 27 हजार स्कूलों को बंद करने का फरमान जारी करती है! यह संविधान प्रदत्त शिक्षा के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।”
उन्होंने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश के गांवों और पिछड़े इलाकों में परिषदीय विद्यालय ही गरीब तबके के बच्चों की एकमात्र उम्मीद होते हैं। सरकार यदि इन्हें बंद करती है, तो इसका सीधा असर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के भविष्य पर पड़ेगा।
8 लाख बच्चों का स्कूल छोड़ना और स्कूल बंद करना — क्या यह समाधान है?
कमांडो अशोक ने सरकार के उस तर्क को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया है कि कम उपस्थिति वाले स्कूलों को बंद किया जा रहा है। उन्होंने बताया:
“पिछले वर्ष लगभग 8 लाख बच्चों ने यूपी में स्कूल छोड़े हैं। कारण था शिक्षा की गिरती गुणवत्ता, अधूरी सुविधाएं और शिक्षक भर्ती में देरी। सरकार को स्कूल बंद करने के बजाय इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधार, शिक्षक प्रशिक्षण और डिजिटल साधनों की उपलब्धता बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए था।”
“दिल्ली और पंजाब मॉडल क्यों नहीं?” — AAP ने पूछा सीधा सवाल
आम आदमी पार्टी की पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रभारी रंजना तिवारी ने सरकार की नीतियों पर निशाना साधते हुए कहा कि:
“दिल्ली सरकार ने सीमित संसाधनों में भी सरकारी स्कूलों को आधुनिक बनाया है। आज दिल्ली के सरकारी स्कूलों के बच्चे NEET, JEE जैसी परीक्षाओं में सफल हो रहे हैं। पंजाब में भी यही मॉडल लागू किया गया। तो फिर उत्तर प्रदेश में स्कूल बंद करना कैसे समाधान हो सकता है?”
उन्होंने जोर देकर कहा कि कम उपस्थिति के आधार पर स्कूल बंद करना समाधान नहीं, बल्कि कुप्रबंधन की सजा है।
गांव के बुजुर्गों और माताओं की चिंता — “बच्चे अब कहां पढ़ेंगे?”
इस खबर ने ग्रामीण क्षेत्रों में भय और आक्रोश दोनों की भावना जगा दी है। गांवों में पहले से ही स्कूल 3–5 किलोमीटर के दायरे में होते हैं, लेकिन अब उन्हें बंद करने से छोटे बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी, जिससे स्कूल ड्रॉपआउट का खतरा और बढ़ेगा।
ग्राम रत्नपुरा की एक अभिभावक शांति देवी ने कहा:
“हमारे गांव में स्कूल बंद हो गया तो हमारी बेटियों को आगे भेजना मुश्किल हो जाएगा। पहले ही हमारे पास कोई प्राइवेट साधन नहीं है।”
‘स्कूलों का नहीं, व्यवस्था का युग्मन हो!’ — विशेषज्ञों की राय भी सरकार के खिलाफ
शिक्षाविदों का मानना है कि सरकार जिस “विद्यालय युग्मन नीति” की बात कर रही है, वह स्थानीय सामाजिक ढांचे की वास्तविकताओं से पूरी तरह अनभिज्ञ है। कई स्कूलों को आपस में मिलाने से छात्र-शिक्षक अनुपात असंतुलित होगा, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता और गिरेगी।
AAP का अल्टीमेटम: “फैसला वापस लो, वरना होगा प्रदेशव्यापी आंदोलन”
मो. अजहर, राकेश अवाना, संदीप भाटी, विपिन भाटी जैसे AAP नेताओं की उपस्थिति में पार्टी ने एक सुर में यह ऐलान किया कि यदि सरकार 15 दिनों के भीतर यह निर्णय वापस नहीं लेती, तो राज्य के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन, सत्याग्रह और शिक्षा बचाओ यात्राएं शुरू की जाएंगी।
“शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009” की भावना के विपरीत है यह निर्णय
2009 में लागू हुए शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के अनुसार, 6–14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। ऐसे में हजारों स्कूल बंद करना इस कानून की भावना के भी विपरीत माना जा रहा है।
आम आदमी पार्टी की मांगें:
- **27,000 स्कूल बंद करने का निर्णय तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए।
- परिषदीय स्कूलों में बुनियादी ढांचे को सुधारा जाए।
- शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया शीघ्र पूरी की जाए।
- कम उपस्थिति वाले स्कूलों की सामाजिक जांच करवाई जाए।
- शिक्षा का दिल्ली मॉडल अपनाने पर विचार किया जाए।**
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