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Breaking News : गुर्जर समाज का राजनीतिक नेतृत्व संकट, अपने ही अपनों को भूल रहे, गैरों के साथ रिश्ते मज़बूत कर रहे – कब जागेगा समाज?, महेंद्र सिंह भाटी वह नाम जिसने गुर्जर राजनीति को ऊंचाई दी, लेकिन यहीं से शुरू हुई सबसे बड़ी त्रासदी

गौतमबुद्ध नगर, रफ़्तार टुडेसुजीत भाटी के FB वॉल से और संपादक गौरव शर्मा। गुर्जर समाज, जिसे कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति का मजबूत स्तंभ माना जाता था, आज अपने ही राजनीतिक नेतृत्व के संकट से जूझ रहा है। जिस समाज ने एक दौर में विधानसभा और सत्ता की चाबी थाम रखी थी, आज वही समाज राजनीतिक रूप से हाशिए पर सिमटता जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर वह ताकतवर गुर्जर समाज कहां खो गया, जिसने कभी बड़े-बड़े राजनीतिक दलों को झुकने पर मजबूर किया था?

गुर्जर समाज का राजनीतिक नेतृत्व संकट केवल नेताओं की महत्वाकांक्षा का नतीजा नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक कमजोरी है। यदि समाज अपने युवाओं को सही दिशा में नहीं ले गया, तो आने वाले समय में उसकी राजनीतिक पहचान और भी धुंधली हो जाएगी।

भाटी जी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि नेतृत्व केवल राजनीति करने का नाम नहीं है, बल्कि समाज की आवाज़ बनने का नाम है। आज जरुरत है कि गुर्जर समाज फिर से उसी दिशा में बढ़े और अपने भीतर से असली नेतृत्व पैदा करे।

महेंद्र सिंह भाटी: वह नाम जिसने गुर्जर राजनीति को ऊंचाई दी

गौतमबुद्ध नगर और आसपास के इलाके में जब भी गुर्जर राजनीति की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है स्वर्गीय महेंद्र सिंह भाटी का। भाटी जी केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि जनता के बीच से उठकर आए सच्चे जनप्रतिनिधि थे। वह सत्ता पाने के लिए राजनीति नहीं करते थे, बल्कि जनता की सेवा को अपना धर्म मानते थे। गली-मोहल्ले से लेकर बड़े जनसमूह तक, हर जगह उनकी आवाज़ गूंजती थी। छोटी-छोटी समस्याओं पर भी वह आम लोगों के साथ खड़े हो जाते।

यही कारण था कि राजनीतिक दल खुद उनके दरवाजे टिकट लेकर पहुंचते थे। भाटी जी ने न केवल गुर्जर समाज को, बल्कि अन्य समाज के युवाओं को भी राजनीति में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।

लेकिन यहीं से शुरू हुई सबसे बड़ी त्रासदी

भाटी जी की यही विशेषता उनके लिए सबसे बड़ी कमजोरी भी साबित हुई। जिन नेताओं को उन्होंने गढ़ा, वही आगे चलकर उनके विरोधी बने और समाज की राजनीति को बुरी तरह तोड़ दिया। उनके निधन के बाद समाज को ऐसा कोई नेतृत्व नहीं मिल पाया, जिसने उनकी तरह युवाओं को खड़ा किया हो।

गुर्जर समाज के नए नेता खुद तक सीमित रह गए। उन्होंने अपने समाज के हितों को पीछे छोड़कर दूसरों को आगे बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि दूसरे समाज के नेता बड़े-बड़े पदों तक पहुंचे और गुर्जर समाज का नेतृत्व धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया।

महेंद्र भाटी जी की विरासत और वर्तमान की हकीकत

महेंद्र सिंह भाटी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने अपने साथ-साथ अन्य समाजों के युवाओं को भी राजनीति में आगे बढ़ाया। लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी त्रासदी भी बन गई। जिन नेताओं को उन्होंने खड़ा किया, वही आगे चलकर उनके विरोध में खड़े हो गए और समाज की राजनीतिक ताक़त को कमजोर किया।

उनके जाने के बाद जो गुर्जर समाज के नेता उभरे, वे केवल अपनी राजनीति और अपने परिवार तक सीमित रह गए। किसी ने भी भाटी जी की तरह समाज से नए नेतृत्व को गढ़ने की कोशिश नहीं की। यही वह मोड़ था, जहां से गुर्जर समाज का राजनीतिक पतन शुरू हुआ।

आज का संकट: अपनों की अनदेखी, गैरों की पैरवी

आज हालात यह हैं कि गुर्जर समाज के कई नेता अपनी राजनीति बचाने के लिए गैरों के आगे झुक रहे हैं। अपने समाज के युवाओं को आगे बढ़ाने की बजाय, वे दूसरों के लिए सीढ़ी का काम कर रहे हैं।

गुर्जर समाज के युवा नेता भी इससे अछूते नहीं हैं।
वे अपने नेतृत्व को दरकिनार कर, दूसरे समाज के नेताओं की भीड़ में शामिल हो रहे हैं।
परिणाम यह है कि उन्हें केवल मोहल्लाई स्तर की राजनीति तक सीमित रखा जाता है, जबकि असली नेतृत्व उनसे दूर रखा जाता है।

गैरों को आगे बढ़ाना और अपनों की अनदेखी

आज स्थिति यह है कि गुर्जर समाज के कई बड़े नेता अपने ही समाज की उपेक्षा कर दूसरों को आगे बढ़ा रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि दूसरे समाज के नेता तो बड़े पदों तक पहुंच गए, लेकिन गुर्जर समाज का नेतृत्व हासिए पर चला गया।

और भी गंभीर यह है कि समाज के युवा नेता भी अपने ही वरिष्ठ नेतृत्व को नज़रअंदाज कर दूसरे समाज के नेताओं के पीछे खड़े दिखाई देते हैं। जबकि उन्हें केवल मोहल्लाई स्तर की राजनीति तक सीमित कर दिया जाता है। नेतृत्व की असली धारा से उन्हें दूर रखा जाता है।

6% प्लॉट और नेताओं की चुप्पी

गुर्जर समाज को पहले मिले 6 प्रतिशत प्लॉट और अन्य अधिकारों की लड़ाई भी आज ठंडी पड़ चुकी है।
सैकड़ों नेता ऐसे हैं जो इस मुद्दे पर खुलकर आवाज़ तक नहीं उठा पा रहे। पार्टी विरोधी गतिविधियों का ठप्पा लगने के डर से वे खामोश रहते हैं।

यही खामोशी आने वाली पीढ़ी को भी कमजोर कर रही है।
अगर यही स्थिति रही तो गुर्जर समाज की अगली पीढ़ी भी नेतृत्व के मामले में और पीछे चली जाएगी।

सीखने की ज़रूरत: दूसरे समाज कैसे आगे बढ़ा रहे अपने युवाओं को

आज गुर्जर समाज को यह देखने की जरूरत है कि अन्य समाज अपने युवाओं को कैसे आगे बढ़ा रहे हैं।
वे न केवल अपने समाज के भीतर से नेतृत्व गढ़ रहे हैं, बल्कि उन्हें मुख्यधारा की राजनीति में भी ला रहे हैं।

इसके उलट गुर्जर समाज में कई बार डमी नेताओं को खड़ा कर दिया जाता है ताकि समाज में विरोधाभास ना पनपे।
लेकिन यह केवल दिखावा है, असली नेतृत्व कभी पनप ही नहीं पाता।

आत्ममंथन का समय: कब जागेगा समाज?

गुर्जर समाज के सामने यह समय आत्ममंथन का है।
नेतृत्व केवल कुर्सी पाने का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज को दिशा देने की जिम्मेदारी है। अगर समाज अपने भीतर से सच्चे और ईमानदार नेताओं को खड़ा करने की परंपरा नहीं शुरू करता, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भी गंभीर हो जाएगी। आज गुर्जर समाज को तय करना होगा कि वह अपने युवाओं को केवल मोहल्लाई राजनीति तक सीमित रखेगा या उन्हें असली नेतृत्व की ओर ले जाएगा।

रफ़्तार टुडे की न्यूज़
Raftar Today
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