Sharda University News : शारदा विश्वविद्यालय ने लिखा इतिहास, इसरो रोबोटिक्स चैलेंज में पूरे भारत में दूसरा स्थान, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से पहले भी मिल चुका है सम्मान, बेंगलुरु स्थित इसरो सैटेलाइट सेंटर में हुआ फाइनल

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे।
भारत के अंतरिक्ष इतिहास में लगातार नए आयाम जोड़ते हुए ग्रेटर नोएडा स्थित शारदा विश्वविद्यालय ने एक बार फिर अपनी प्रतिभा और नवाचार का लोहा मनवाया है। विश्वविद्यालय के कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग की टीम सूर्या ने प्रतिष्ठित इसरो रोबोटिक्स चैलेंज 2025 में अखिल भारतीय स्तर पर दूसरा स्थान प्राप्त किया है। यह उपलब्धि केवल विश्वविद्यालय ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के लिए गौरव का क्षण है।
प्रतियोगिता में कठिन सफर, लेकिन शारदा की टीम ने दिखाया दम
दिल्ली में आयोजित इस प्रतियोगिता में देशभर से आई 510 टीमों ने भाग लिया।शुरुआती स्क्रीनिंग के बाद केवल 222 टीमें चुनी गईं।
इनसे आगे बढ़कर 177 टीमों ने क्वालीफिकेशन राउंड में अपनी जगह बनाई। इसके बाद कठिन चुनौतियों में से गुजरते हुए केवल 37 टीमें एलिमिनेशन राउंड तक पहुंचीं।
अंततः प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे IIT, NIT और IIIT की टीमों के साथ केवल 16 टीमें फाइनल राउंड तक पहुंच पाईं।
इन्हीं 16 चुनिंदा टीमों में शारदा विश्वविद्यालय की टीम सूर्या ने अपने अद्भुत प्रदर्शन से दूसरा स्थान अर्जित कर सबको चौंका दिया।
बेंगलुरु स्थित इसरो सैटेलाइट सेंटर में हुआ फाइनल
फाइनल फील्ड राउंड का आयोजन बेंगलुरु स्थित इसरो यूआरएससी (URSC) सैटेलाइट सेंटर में किया गया। यहां टीमों को अपने बनाए सिस्टम का परीक्षण वास्तविक परिस्थितियों में करना था।
शारदा की टीम ने अपने नवीनतम एल्गोरिदम आधारित यूएवी (Unmanned Aerial Vehicle) सिस्टम का प्रदर्शन किया। इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह बिना GPS के काम करने में सक्षम था।
टीम सूर्या की अनूठी खोज: जीपीएस-रहित यूएवी सिस्टम
टीम सूर्या ने जो ड्रोन सिस्टम विकसित किया है, वह सामान्य तकनीकों से बिल्कुल अलग और उन्नत है। यह नेविगेशन और स्थानीयकरण की सुविधा देता है। ड्रोन अपने ऑनबोर्ड नेविगेशन सिस्टम से खुद को पहचान सकता है।
यह स्वचालित रूप से सुरक्षित लैंडिंग क्षेत्रों की पहचान कर सकता है। अंत में यह सटीक और स्वचालित लैंडिंग करने में सक्षम है।
इस तकनीक का उपयोग भविष्य में न केवल अंतरिक्ष अनुसंधान बल्कि आपदा प्रबंधन, रक्षा और एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों में भी किया जा सकता है।

टीम की संरचना और मार्गदर्शन
टीम सूर्या का नेतृत्व कार्तिक पांडे (टीम लीडर) और मुस्कान (सह-लीडर) ने किया। इनके साथ प्रशांत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पूरी टीम को विश्वविद्यालय के फैकल्टी मेंबर्स रानी अस्त्य और जितेंद्र सिंह का मार्गदर्शन मिला। साथ ही विश्वविद्यालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए आर्थिक सहायता भी प्रदान की।
यानी यह उपलब्धि पूरी तरह से विद्यार्थियों की मेहनत, शिक्षकों के मार्गदर्शन और संस्थान के सहयोग का परिणाम है।
पहले भी राष्ट्रपति से मिल चुका है सम्मान
गौरतलब है कि इससे पहले भी शारदा विश्वविद्यालय की टीम सूर्या को वर्ष 2024 में आयोजित इसरो रोवर चैलेंज में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा तृतीय पुरस्कार प्रदान किया गया था।
इस बार के इसरो रोबोटिक्स चैलेंज में दूसरा स्थान प्राप्त कर टीम ने अपने प्रदर्शन की निरंतरता और प्रतिभा का प्रमाण दिया है।
विश्वविद्यालय के अधिकारियों की प्रतिक्रियाएँ
विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर डॉ. परमानंद ने कहा:
“इस प्रतियोगिता में 510 टीमों में से दूसरा स्थान पाना हमारे लिए गर्व की बात है। यह छात्रों की लगन, नवाचार और कड़ी मेहनत का नतीजा है।”
कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग के एचओडी सुदीप वार्ष्णेय ने कहा:
“हमारी टीम ने दिखा दिया कि संसाधनों से ज्यादा मायने रखती है मेहनत और नवाचार। इस उपलब्धि से हमारे छात्रों को और प्रेरणा मिलेगी।”
विश्वविद्यालय के चांसलर पी.के. गुप्ता ने भी टीम को बधाई देते हुए कहा:
“हमारा लक्ष्य विद्यार्थियों को सक्षम बनाना और भारत को विकसित बनाने में योगदान करना है। यह सफलता हमारी शैक्षणिक गुणवत्ता और शोध की दिशा में उठाए गए ठोस कदमों का परिणाम है।”
विश्वविद्यालय के चांसलर पीके गुप्ता ने टीम को बधाई देते हुए कहा कि हमारा लक्ष्य यही है कि विद्यार्थियों को सक्षम बनाएं और भारत को विकसित बनाने में मदद कर सकें।पिछले साल में शुरू हुई यह यात्रा अथक प्रयास, नवाचार और टीम वर्क का परिणाम रही है। यह सम्मान प्राप्त करना न केवल हमारी सफलता का उत्सव है, बल्कि रोबोटिक्स को आगे बढ़ाने और भारत के अंतरिक्ष नवाचारों को मज़बूत करने में योगदान जारी रखने की प्रेरणा भी है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?
इसरो रोबोटिक्स चैलेंज में दूसरा स्थान केवल एक ट्रॉफी या पुरस्कार नहीं बल्कि भारत के रोबोटिक्स और स्पेस रिसर्च भविष्य की दिशा तय करने वाला मील का पत्थर है।
इससे भारतीय विद्यार्थियों की क्षमता और नवाचार को वैश्विक मंच पर पहचान मिली। भविष्य में भारत को आत्मनिर्भर बनाने और “मेक इन इंडिया” अभियान को मज़बूत करने में यह योगदान देगा।
यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में विद्यार्थियों को शोध और नवाचार की दिशा में प्रोत्साहित करेगी।
शारदा विश्वविद्यालय की टीम सूर्या ने यह साबित कर दिया है कि अगर जज़्बा और मेहनत हो तो कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। इसरो रोबोटिक्स चैलेंज में दूसरा स्थान जीतना केवल विश्वविद्यालय ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात है।
अब यह टीम और भी बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर भारत के अंतरिक्ष मिशनों में योगदान देगी।



