GBU University News : “कानून के आगे नहीं चली मनमानी”इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, जीबीयू कुलपति का आदेश रद्द, डॉ. विश्वास त्रिपाठी की रजिस्ट्रार पद पर गरिमामयी वापसी, शिक्षक भर्ती और फीस घोटाले से जुड़ा है पूरा मामला

ग्रेटर नोएडा / प्रयागराज, रफ़्तार टूडे। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी प्रभाव डालने वाले फैसले में गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय (GBU) के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह द्वारा पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी को पद से कार्यमुक्त कर दिया गया था। हाई कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यह आदेश न केवल अवैधानिक है, बल्कि पूर्वाग्रह से प्रेरित भी प्रतीत होता है, क्योंकि विश्वविद्यालय अपने फैसले के समर्थन में कोई ठोस वैधानिक प्रावधान प्रस्तुत नहीं कर सका।
यह फैसला केवल एक अधिकारी की बहाली भर नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालयी प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के राज का मजबूत संदेश भी देता है।
हाई कोर्ट की दो टूक: “बिना कानून के सहारे नहीं चल सकता आदेश”
न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी भी वैधानिक पद पर कार्यरत अधिकारी को हटाने के लिए स्पष्ट कानूनी अधिकार और प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कुलपति द्वारा जारी आदेश के समर्थन में विश्वविद्यालय कोई ऐसा नियम या अधिनियम नहीं दिखा सका, जिससे यह साबित हो सके कि रजिस्ट्रार को इस तरह कार्यमुक्त किया जाना कानूनसम्मत था।
कोर्ट ने यह भी माना कि यह आदेश नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
शिक्षक भर्ती और फीस घोटाले से जुड़ा है पूरा मामला
गौरतलब है कि गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय इन दिनों शिक्षक भर्ती और छात्रों की फीस में कथित धांधली को लेकर विवादों में घिरा हुआ है। एक महिला द्वारा की गई शिकायत के आधार पर लोकायुक्त ने इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब तलब किया था। इसमें कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह और तत्कालीन कुलसचिव (रजिस्ट्रार) डॉ. विश्वास त्रिपाठी दोनों से स्पष्टीकरण मांगा गया था।
लोकायुक्त द्वारा जवाब मांगे जाने के कुछ ही समय बाद, 29 दिसंबर को कुलपति ने आदेश जारी करते हुए डॉ. विश्वास त्रिपाठी को रजिस्ट्रार पद से कार्यमुक्त कर दिया। इस फैसले ने विश्वविद्यालय परिसर से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक हलचल मचा दी।
हाई कोर्ट पहुंचा मामला, मिला न्याय
अपने खिलाफ जारी आदेश को मनमाना और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए डॉ. विश्वास त्रिपाठी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि उन्हें बिना किसी विभागीय जांच, बिना कारण बताओ नोटिस और बिना वैधानिक अधिकार के पद से हटाया गया, जो कि कानूनन गलत है।
हाई कोर्ट में डॉ. विश्वास त्रिपाठी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी.के. सिंह ने मजबूत पैरवी की, जबकि विश्वविद्यालय की ओर से उत्तर प्रदेश सरकार के अपर महाधिवक्ता ने पक्ष रखा।
“आदेश में पूर्वाग्रह की बू”, कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि जिस समय लोकायुक्त जांच चल रही थी, उसी दौरान रजिस्ट्रार को हटाया जाना कई सवाल खड़े करता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह निर्णय निष्पक्ष प्रशासनिक कार्रवाई कम और पूर्वाग्रहपूर्ण कदम अधिक था।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने कुलपति के आदेश को निरस्त करते हुए डॉ. विश्वास त्रिपाठी को रजिस्ट्रार पद पर बहाल करने का स्पष्ट निर्देश दिया।
प्रताड़ना की आशंका पर कोर्ट को मिला आश्वासन
सुनवाई के दौरान डॉ. विश्वास त्रिपाठी ने यह भी आशंका जताई कि बहाली के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उन्हें मानसिक या प्रशासनिक रूप से प्रताड़ित किया जा सकता है। इस पर अपर महाधिवक्ता ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से किसी भी प्रकार की प्रताड़ना नहीं की जाएगी।
कोर्ट ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले का निस्तारण किया।
जीबीयू प्रशासन पर सवाल, सिस्टम पर बहस
इस फैसले के बाद गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय विश्वविद्यालयों में पदाधिकारियों के अधिकारों की सीमा तय करने वाला नजीरन फैसला साबित हो सकता है।
वहीं, छात्रों और शिक्षकों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि यदि लोकायुक्त जांच के दौरान अधिकारियों को इस तरह हटाया जाएगा, तो पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला केवल डॉ. विश्वास त्रिपाठी की व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन, संस्थागत मर्यादा और न्यायिक हस्तक्षेप की मजबूती का प्रतीक है। यह निर्णय साफ संदेश देता है कि किसी भी पद पर बैठा व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है, और मनमाने आदेश न्याय की कसौटी पर टिक नहीं सकते।
अब सभी की निगाहें लोकायुक्त जांच और विश्वविद्यालय प्रशासन के अगले कदमों पर टिकी हैं।



