High Court News : “हाईकोर्ट की मुहर, AOA पर फिर कायम हुआ भरोसा!”, पंचशील हाइनिश चुनाव विवाद में बड़ा उलटफेर, DR और SDM के आदेश रद्द, एक महीने में नए चुनाव के निर्देश से सोसायटी में हलचल तेज, वर्तमान समिति को मिली वैधता, सभी फैसले रहेंगे प्रभावी

ग्रेटर नोएडा वेस्ट, रफ़्तार टूडे। ग्रेटर नोएडा वेस्ट की चर्चित हाईराइज सोसायटी पंचशील हाइनिश में पिछले एक वर्ष से चल रहे AOA चुनाव विवाद पर आखिरकार माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा और निर्णायक फैसला सुना दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले ने न केवल सोसायटी की मौजूदा AOA कार्यकारिणी को बड़ी राहत दी है, बल्कि उन तमाम दावों और आरोपों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके आधार पर लगातार यह प्रचारित किया जा रहा था कि समिति अवैध हो चुकी है और चुनाव स्वतः निरस्त माने जाएंगे।
माननीय हाईकोर्ट ने डिप्टी रजिस्ट्रार गाजियाबाद और एसडीएम दादरी द्वारा पारित आदेशों को निरस्त करते हुए स्पष्ट कहा कि वर्ष 2025 में हुए AOA चुनाव को अवैध नहीं माना जा सकता। साथ ही अदालत ने वर्तमान कार्यकारिणी को वैध करार देते हुए निर्देश दिए कि एक माह के भीतर निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पूरी कराई जाए। फैसले के बाद सोसायटी में राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
एक साल से विवादों में थी पंचशील हाइनिश सोसायटी
पंचशील हाइनिश सोसायटी में AOA चुनाव को लेकर विवाद लंबे समय से चल रहा था। आरोप-प्रत्यारोप, शिकायतें, प्रशासनिक हस्तक्षेप और न्यायालयी प्रक्रियाओं के कारण सोसायटी का माहौल लगातार तनावपूर्ण बना हुआ था। शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से दावा किया जा रहा था कि वर्तमान समिति “कालातीत” हो चुकी है और उसके पास कार्य करने का अधिकार नहीं बचा है।
इसी विवाद के बीच डिप्टी रजिस्ट्रार और एसडीएम स्तर से आदेश जारी हुए, जिनमें चुनाव प्रक्रिया और समिति की वैधता पर सवाल उठाए गए। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां वर्तमान AOA अध्यक्ष विनोद नेगी ने याचिका दायर कर प्रशासनिक आदेशों को चुनौती दी।
“अदालत की अंतरात्मा को झकझोरने वाला मामला” — हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
माननीय हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनाव को निरस्त करने की पूरी प्रक्रिया अदालत की “अंतरात्मा को झकझोरने वाली” प्रतीत होती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—22 मार्च 2025 को हुआ चुनाव वैध माना जाएगा
बाद की घटनाओं के आधार पर चुनाव को अवैध नहीं ठहराया जा सकता
Prescribed Authority का 24 अप्रैल 2026 का आदेश पूरी तरह निरस्त किया जाता है
अदालत ने यह भी माना कि आदेश पारित करते समय कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी की गई।
“केवल आरोप लगाने से चुनाव अवैध नहीं हो जाते”
हाईकोर्ट ने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि केवल शिकायतें या आरोप लगा देने मात्र से किसी चुनाव को स्वतः अवैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि पहले यह साबित करना आवश्यक होगा कि विवाद कानूनन वैध था और क्या शिकायत वास्तव में कम-से-कम एक-चौथाई सदस्यों के समर्थन से दायर की गई थी या नहीं।
इस टिप्पणी के बाद उन दावों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया है, जिनमें लगातार यह प्रचार किया जा रहा था कि AOA समाप्त हो चुकी है और उसकी वैधता खत्म हो गई है।
वर्तमान समिति को मिली वैधता, सभी फैसले रहेंगे प्रभावी
माननीय हाईकोर्ट ने Society Bye-laws की Clause 26(iii) को स्वीकार करते हुए कहा कि जब तक नई समिति का विधिवत गठन और उसकी पहली बैठक नहीं हो जाती, तब तक वर्तमान पदाधिकारी अपने दायित्व निभाते रहेंगे।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि—
मार्च 2025 में चुनी गई AOA समिति वैध मानी गई
पिछले एक वर्ष में लिए गए सभी प्रशासनिक और वित्तीय फैसले प्रभावी रहेंगे
वर्तमान कार्यकारिणी का अधिकार बरकरार रहेगा
यह फैसला मौजूदा AOA के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।
“समिति चुनाव से भाग नहीं रही थी” — कोर्ट ने माना
AOA प्रतिनिधियों की ओर से लगातार कहा जा रहा था कि चुनाव प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी थी। कोर्ट ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया कि 21 फरवरी 2026 को चुनाव की घोषणा की गई थी, लेकिन बाद में प्रशासनिक और न्यायिक आदेशों के कारण प्रक्रिया प्रभावित हुई।
इससे यह स्पष्ट हो गया कि समिति चुनाव कराने से बच नहीं रही थी, बल्कि परिस्थितियों के चलते प्रक्रिया रुक गई थी।

विकास कार्य भी हुए प्रभावित
फैसले के बाद AOA अध्यक्ष विनोद नेगी और सचिव विजय मोहन रस्तोगी ने संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा कि अनावश्यक विवाद और लगातार प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण सोसायटी के कई जरूरी विकास कार्य प्रभावित हुए।
उनके अनुसार— रेनोवेशन कार्य, प्लास्टर रिपेयर, पेंटिंग प्रोजेक्ट अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार समय पर शुरू नहीं हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि सोसायटी को लगातार कोर्ट और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझाए रखने से आर्थिक नुकसान भी हुआ।
“सोसायटी फंड पर पड़ा अतिरिक्त बोझ”
AOA प्रतिनिधियों ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में सोसायटी चुनाव लगभग 70 से 75 हजार रुपये में पूरे हो जाते हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर चुनाव कराने की स्थिति में यह खर्च 3 से 4 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। इसका सीधा भार सोसायटी फंड और अंततः निवासियों पर ही पड़ता है।
एक माह के भीतर होंगे नए चुनाव
हाईकोर्ट के निर्देशों का सम्मान करते हुए AOA पदाधिकारियों ने घोषणा की कि अब निष्पक्ष, पारदर्शी और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। एक महीने के भीतर नई कार्यकारिणी के गठन के लिए चुनाव कराए जाएंगे। विनोद नेगी, विजय मोहन रस्तोगी, अमरेंद्र प्रताप सिंह, हिमांशु और बिकेश श्रीवास्तव ने निवासियों से अपील की कि वे व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर “Society First” की भावना के साथ आगे बढ़ें।
सोसायटी राजनीति से उठे बड़े सवाल
यह पूरा मामला अब केवल एक सोसायटी चुनाव का विवाद नहीं रह गया, बल्कि इसने हाईराइज सोसायटियों में बढ़ती राजनीति, प्रशासनिक हस्तक्षेप और कानूनी जटिलताओं पर भी बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह फैसला अन्य AOA विवादों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।



