Noida & Greater Noida Authority : “विज्ञापन के नाम पर प्राधिकरण को लगाया करोड़ों का चूना, यूनिपोल और एफओबी के ठेकेदारों ने खेला ठगी का हाईटेक खेल, नाम बदलकर फिर से हथियाए टेंडर!”, जब कानून बना दिखावा और ठेकेदार बना राजा, तो यूनिपोल के नीचे दब गया सिस्टम का ईमान
नाम बदलो, ठेका ले लो – भ्रष्ट एजेंसियों की पुरानी चाल, NMRC ने दिखाया रास्ता, पर बाकी प्राधिकरण क्यों मौन?

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे।।
यूनिपोल और फुट ओवर ब्रिज (एफओबी) जैसे प्रोजेक्ट आम तौर पर शहर की सुंदरता बढ़ाने और सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की आय बढ़ाने की यह योजना अब गहरे भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई है। यहां विज्ञापन एजेंसियां ठेका लेते समय तो नियमों की बात करती हैं, लेकिन बाद में नियमों को ऐसे कुचलती हैं जैसे ये कागज़ पर लिखी कोई कहानी हो।
क्या है यूनिपोल और एफओबी का असली चेहरा?
- यूनिपोल: बड़ी सड़कों और चौक-चौराहों पर लगे भारी-भरकम खंभों पर विज्ञापन लगाने का प्लेटफॉर्म।
- एफओबी (Foot Over Bridge): पैदल यात्रियों के लिए सड़क पार करने की ऊंची संरचना, जो अब केवल विज्ञापन बोर्डों से भरी होती है।
इन दोनों का उद्देश्य जनता की सुविधा और सरकारी राजस्व बढ़ाना है, लेकिन आज यही ठेकेदारों की “कमाई की मशीन” बन चुके हैं।
नाम बदलो, ठेका ले लो – भ्रष्ट एजेंसियों की पुरानी चाल
हाल के वर्षों में कुछ ठेकेदारों ने यूनिपोल और एफओबी के माध्यम से करोड़ों की कमाई की और जब बकाया राशि चुकाने की बारी आई, तो अदालत का दरवाजा खटखटाया।
- 2018 में अंश इंटरनेशनल और चिनार इम्पैक्स नाम की दो एजेंसियों और ना जाने कितनी एजेंसी को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से सात यूनिपोल ठेके मिले।
- करोड़ों की देनदारी के बावजूद दोनों एजेंसियों ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट, फिर आर्बिट्रेशन कोर्ट और अब वाणिज्यिक न्यायालय का सहारा लिया।
- और दिलचस्प बात ये कि वही एजेंसियां नाम और मालिक बदलकर दोबारा ठेका लेने की कोशिश कर रही हैं — और प्राधिकरण का सिस्टम इसे नजरअंदाज कर रहा है!
कानूनी लड़ाई को बनाया गया ढाल, देनदारी से बचने का बहाना
इन एजेंसियों का तर्क है कि:
- कोरोना के दौरान काम ठप रहा
- बिजली कनेक्शन और NOC नहीं मिला
- लोकेशन सही नहीं थी
जबकि प्राधिकरण ने दस्तावेजों के साथ इन दावों को खारिज कर दिया। फिर भी मामला अब वाणिज्यिक अदालत में खिंच रहा है — यानी भुगतान न करने की रणनीति।
अवैध यूनिपोल, दोतरफा विज्ञापन और मिलीभगत
- यूनिपोल के तय आकार से बड़े बोर्ड लगाए जाते हैं।
- ठेके में केवल एक ओर विज्ञापन की अनुमति होती है, लेकिन ठेकेदार दोनों ओर विज्ञापन लगाकर दोगुनी कमाई करते हैं।
- कई बार बिना अनुमति के अतिरिक्त यूनिपोल लगाए जाते हैं — और यह सब प्राधिकरण के कुछ विभागीय अफसरों की मिलीभगत से होता है।
हाल ही में ग्रेटर नोएडा वेस्ट में मीडिया रिपोर्ट्स के बाद कई अवैध यूनिपोल हटाए गए। मगर सवाल वही – जब मीडिया न बोले, तो अफसर क्यों जागे?
एफओबी: जनता के लिए नहीं, एजेंसियों के लिए फायदे का पुल
एफओबी जिनका उपयोग शायद ही कोई करता है:
- उनकी लिफ्ट खराब रहती हैं।
- सफाई नहीं होती।
- लेकिन विज्ञापन बोर्ड हमेशा जगमग करते हैं।
इन पर प्राधिकरण को मामूली रॉयल्टी मिलती है, लेकिन ठेकेदारों की जेब बीस साल तक भरती रहती है।
NMRC ने दिखाया रास्ता, पर बाकी प्राधिकरण क्यों मौन?
नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (NMRC) ने मेट्रो पिलर और स्टेशन पर विज्ञापन के लिए ऐसे बदनाम ठेकेदारों को ठेका नहीं दिया।
लेकिन नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने:
- पुराने रिकॉर्ड की जांच नहीं की।
- नाम बदलने के बावजूद नई एजेंसी को पहचानने की कोशिश नहीं की।
- और अब वही एजेंसियां फिर से ठेके लेने में सफल हो रही हैं।
प्रशासन के सामने हैं ये जरूरी सवाल:
- क्यों नहीं बनाई जाती ठेकेदारों की ब्लैकलिस्ट?
- क्यों नहीं होती यूनिपोल और एफओबी की ऑडिटिंग?
- कब तक जनता के टैक्स का पैसा ठेकेदारों की अदालतों में उलझा रहेगा?
- क्यों नहीं बनाई जाती जन रिपोर्टिंग वेबसाइट, जहाँ कोई भी ठेका, बकाया और एजेंसी का नाम सार्वजनिक हो?
क्या कहते हैं शहरी नियोजन विशेषज्ञ?
शहरी योजनाकारों का मानना है कि:
“यूनिपोल और एफओबी जैसी व्यवस्थाएं अच्छी नियत से शुरू की गई थीं, लेकिन बिना निगरानी और सख्ती के यह सिस्टम खुद भ्रष्टाचार का चेहरा बन गया है।”
Raftar Today की सिफारिशें:
- प्राधिकरणों को चाहिए कि यूनिपोल और एफओबी से जुड़ी हर एजेंसी की पृष्ठभूमि जांचे।
- सार्वजनिक पोर्टल पर सभी ठेकों, बकाया राशि और अदालती स्थिति की जानकारी दी जाए।
- जनता के टैक्स से हुए नुकसान की FIR दर्ज की जाए।
- नई यूनिपोल नीति बनाई जाए, जिसमें डिजिटल निगरानी, GPS ट्रैकिंग और रीयल टाइम रिपोर्टिंग हो।
निष्कर्ष: सिस्टम के छेद बंद कीजिए वरना ‘विज्ञापन’ की जगह ‘घोटाले’ चमकेंगे
यूनिपोल और एफओबी का सिस्टम अब राजस्व के बजाय भ्रष्टाचार का इंजन बन गया है। अगर प्राधिकरण अब भी नहीं जागे, तो आने वाले वर्षों में शहर की छवि और साख दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।
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