Ram Katha News : “राम कथा के आठवें दिन गूंजा भक्ति का संदेश, भरत के त्याग और केवट की श्रद्धा से सीखने का आह्वान!”, ऐच्छर-बिरोड़ा के रामलीला मैदान में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, कथा व्यास ने जीवन दर्शन से जोड़ा आध्यात्म

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे । ग्रेटर नोएडा के ऐच्छर-बिरोड़ा सेक्टर पाई-1 स्थित रामलीला मैदान में श्री धार्मिक रामलीला कमेटी के तत्वाधान में चल रही श्रीराम कथा का सोमवार, 13 अप्रैल 2026 को आठवां दिन भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रहा। अंतर्राष्ट्रीय कथावाचक अतुल कृष्ण भारद्वाज जी “महाराज” की अमृतमयी वाणी ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया और जीवन के गूढ़ संदेशों से जोड़ दिया।
“भरत और केवट—त्याग, समर्पण और सच्ची भक्ति के प्रतीक”
कथा व्यास अतुल कृष्ण भारद्वाज जी ने अपने प्रवचन में कहा कि श्रीराम कथा केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला मार्गदर्शन है। उन्होंने भरत और केवट के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि हमें उनके जीवन से त्याग, सेवा और समर्पण की प्रेरणा लेनी चाहिए।
उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि “राम और भरत ने संपत्ति का नहीं, बल्कि विपत्ति का बंटवारा किया,” जो आज के समाज के लिए एक गहरा संदेश है। वहीं केवट का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण होता है।
“केवट प्रसंग—जब भक्ति के आगे भगवान भी हुए नतमस्तक”
कथा के दौरान उन्होंने वनगमन के प्रसंग का मार्मिक वर्णन करते हुए श्रीराम और निषादराज गुह की मित्रता को याद किया। इसके बाद गंगा पार कराने वाले केवट प्रसंग को बड़े ही भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया।
उन्होंने बताया कि जब भगवान श्रीराम गंगा पार करने पहुंचे, तो केवट ने विनम्रतापूर्वक कहा कि जब तक वह उनके चरण नहीं धोएगा, तब तक उन्हें नाव में नहीं बैठाएगा। अंततः भगवान को केवट की भक्ति के आगे झुकना पड़ा और केवट ने उनके चरण धोकर स्वयं को और अपनी सात पीढ़ियों को धन्य कर लिया।
“सच्ची भक्ति से ही मिलता है मोक्ष का मार्ग”
महाराज जी ने कहा कि यदि मनुष्य सच्चे मन से भगवान की भक्ति करता है, तो उसे निश्चित रूप से ईश्वर के दर्शन होते हैं और वह जीवन रूपी भवसागर से पार हो जाता है।
उन्होंने श्रोताओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में भक्ति, सेवा और समर्पण को अपनाकर ही वास्तविक सुख और शांति प्राप्त की जा सकती है।
“राम-भरत मिलन—प्रेम और त्याग का अद्भुत उदाहरण”
कथा में राम-भरत मिलन प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि प्रभु श्रीराम ने भरत को रघुवंश का हंस कहा है। भरत प्रेम और त्याग के सागर हैं, जिन्होंने चित्रकूट से श्रीराम की चरण पादुका लाकर सिंहासन पर स्थापित की और स्वयं राज्य का त्याग कर दिया।
यह प्रसंग त्याग और कर्तव्यनिष्ठा की सर्वोच्च मिसाल प्रस्तुत करता है।
“महापुरुषों के उदाहरण से सीख—योग्यता बढ़ाना ही सफलता का मार्ग”
कथा के दौरान महाराज जी ने जीवन में आत्ममंथन और योग्यता वृद्धि पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि जब हम अपने जीवन की तुलना भगवान श्रीराम के जीवन से करते हैं, तो हमें एहसास होता है कि हमें अभी बहुत कुछ सीखना है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम और स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उन्होंने अपने ज्ञान और कर्म से देश और दुनिया में भारत का नाम ऊंचा किया।
“कष्टों से सीखना ही श्रेष्ठता की पहली सीढ़ी”
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति सच्चा ज्ञानी होता है, वही समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। जीवन में आने वाली विषम परिस्थितियों से घबराने की बजाय उनसे सीखने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि यही श्रेष्ठ बनने का पहला कदम है।
“हनुमान भक्ति और राम नाम—जीवन को बनाएं सरल और सफल”
महाराज जी ने अंत में कहा कि हनुमान जी की तरह भगवान के नाम का सुमिरन और कीर्तन जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। यही हमें मानसिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।
“यजमानों और श्रद्धालुओं की रही विशेष उपस्थिति”
आज के कथा आयोजन में मुख्य यजमान के रूप में श्री हरवीर मावी, सह-यजमान शेर सिंह भाटी और धीरज शर्मा उपस्थित रहे, जबकि दैनिक यजमान के रूप में विजय प्रधान जी ने भूमिका निभाई।
इसके अलावा वरिष्ठ प्रचारक ईश्वर दयाल जी, स्वामी सुशील जी महाराज, प्रांत प्रचारक वेदपाल जी, जिला प्रचारक नेम पाल जी, अध्यक्ष आनंद भाटी सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य लोग और श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
“भक्ति, ज्ञान और प्रेरणा का संगम—राम कथा बनी जन-जन की आस्था का केंद्र”
रामलीला मैदान में चल रही यह श्रीराम कथा न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह समाज को जोड़ने, संस्कार देने और जीवन को सही दिशा दिखाने का एक सशक्त माध्यम बन रही है।



