उम्मीदवार, कांग्रेस के खाते में जा सकती हैं 75 सीटें; जीत की संभावना वाले फॉर्मूले पर होगा फैसला, PDA रणनीति भी सपा के लिए महत्वपूर्ण, कांग्रेस का दावा 200 सीटों का, लेकिन सपा 75 सीटों तक सीमित रखने के पक्ष में; अखिलेश यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की तैयारी
इंडिया ब्लॉक की पिछली महत्वपूर्ण बैठक 8 जून को दिल्ली में हुई थी। उस दौरान गठबंधन के नेताओं के बीच नियमित अंतराल पर बैठक करने की बात सामने आई थी। अगस्त में संसद सत्र और राजनीतिक गतिविधियों के चलते प्रस्तावित बैठक नहीं हो सकी। अब सितंबर में सीट बंटवारे को लेकर बातचीत तेज होने की संभावना है। हालांकि 328-75 का फॉर्मूला फिलहाल अंतिम नहीं है, लेकिन इससे दोनों दलों की शुरुआती रणनीति का संकेत जरूर मिलता है। 2027 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 403 सीटों पर मुकाबला बेहद महत्वपूर्ण होगा। ऐसे में सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारा केवल संख्या का सवाल नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि गठबंधन किन क्षेत्रों में सीधे मुकाबले की रणनीति अपनाता है और किन सीटों पर सहयोगी दल को प्राथमिकता देता है।

लखनऊ, रफ़्तार टूडे। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर सियासी मंथन तेज हो गया है। इंडिया ब्लॉक के दोनों प्रमुख दलों के बीच अभी सीटों का औपचारिक बंटवारा तय नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक हलकों में संभावित फॉर्मूले को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सूत्रों के मुताबिक समाजवादी पार्टी करीब 328 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है, जबकि कांग्रेस को लगभग 75 सीटें दिए जाने के फॉर्मूले पर विचार किया जा रहा है। हालांकि कांग्रेस की ओर से विधानसभा चुनाव में करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा किया जाता रहा है। ऐसे में दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर अंतिम सहमति किस फॉर्मूले पर बनेगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। माना जा रहा है कि सीटों के बंटवारे पर निर्णायक बातचीत सितंबर में हो सकती है।
सपा की रणनीति को समझने वालों का कहना है कि पार्टी केवल सीटों की संख्या के आधार पर कांग्रेस को हिस्सेदारी देने के पक्ष में नहीं है। उसका जोर ऐसे विधानसभा क्षेत्रों पर है, जहां गठबंधन के उम्मीदवार की जीत की वास्तविक संभावना हो। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी सार्वजनिक रूप से संकेत दे चुके हैं कि गठबंधन में सीट से ज्यादा जीत का समीकरण महत्वपूर्ण होगा।
75 सीटों का फॉर्मूला कैसे तैयार हुआ?
सपा संगठन से जुड़े नेताओं के बीच चल रही चर्चा के मुताबिक कांग्रेस को लगभग 75 सीटें देने के पीछे कई राजनीतिक और संगठनात्मक गणित हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को 17 लोकसभा सीटें दी गई थीं। एक लोकसभा क्षेत्र में औसतन पांच विधानसभा सीटें मानी जाएं तो इसका गणित करीब 85 विधानसभा सीटों तक पहुंचता है। हालांकि विधानसभा चुनाव में परिस्थितियां लोकसभा चुनाव जैसी नहीं होतीं। यही वजह है कि सपा कांग्रेस को 85 के बजाय करीब 75 सीटों के आसपास सीमित रखने पर विचार कर रही है। इसमें भी सीटों का चयन केवल क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की स्थिति और चुनावी समीकरण के आधार पर किया जा सकता है।
सपा का संभावित फॉर्मूला यह है कि कांग्रेस को उन्हीं सीटों पर मौका मिले, जहां उसके उम्मीदवार या संगठन की स्थिति गठबंधन को जीत दिलाने में मदद कर सके।

कई सीटों पर कांग्रेस का सिंबल, लेकिन उम्मीदवार सपा का?
सीट बंटवारे की चर्चा में एक और दिलचस्प पहलू सामने आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक कुछ विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर सपा समर्थित या सपा के पसंदीदा उम्मीदवार को मैदान में उतारने का विकल्प भी बातचीत का हिस्सा हो सकता है। हालांकि इस संबंध में अभी कोई औपचारिक निर्णय नहीं हुआ है। यह व्यवस्था तभी संभव होगी, जब दोनों दल किसी सीट पर उम्मीदवार को लेकर सहमत हों। इसका उद्देश्य सीटों की संख्या से ज्यादा गठबंधन के वोटों को एकजुट रखना और भाजपा के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार उतारना हो सकता है।
पश्चिमी यूपी की सीटों पर कांग्रेस की नजर
सपा के संभावित सीट बंटवारे के फॉर्मूले में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटें कांग्रेस के खाते में जाने की चर्चा है। इनमें नोएडा, हापुड़, गाजियाबाद, बुलंदशहर, मथुरा और आगरा जैसी सीटों के नाम सामने आ रहे हैं। इनमें से कई क्षेत्रों में लंबे समय से भाजपा का प्रभाव रहा है। ऐसे में सपा इन सीटों पर कांग्रेस को मैदान में उतारकर गठबंधन के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण को आजमाना चाह सकती है।
इसके अलावा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के प्रभाव वाले वाराणसी क्षेत्र में भी कांग्रेस को कुछ सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है। इनमें रोहनिया, वाराणसी उत्तर, वाराणसी दक्षिण, वाराणसी कैंट और सेवापुरी जैसी सीटों का जिक्र किया जा रहा है। हालांकि यह अभी संभावित चर्चा है और अंतिम सूची में इन सीटों का शामिल होना सीट बंटवारे की आधिकारिक बातचीत पर निर्भर करेगा।

कई जिलों में कांग्रेस के लिए सीट तलाशना चुनौती
सपा के सामने एक चुनौती यह भी है कि प्रदेश के कुछ जिलों में कांग्रेस का संगठन और चुनावी आधार अपेक्षाकृत कमजोर है। सपा नेताओं के अनुसार मैनपुरी, एटा, इटावा, फर्रुखाबाद, फिरोजाबाद, आजमगढ़, गाजीपुर, मऊ, रामपुर और मुरादाबाद जैसे जिलों में कांग्रेस को सीट देने का मजबूत स्थानीय आधार तलाशना आसान नहीं होगा। ऐसे में सीटों का संतुलन बनाने के लिए कांग्रेस को कुछ जिलों में एक से अधिक सीटें दी जा सकती हैं, जबकि कुछ ऐसे जिलों में उसे सीट न मिले जहां उसका संगठन चुनावी रूप से प्रभावी नहीं माना जाता।
यही वजह है कि सपा की ओर से बार-बार ‘सीट नहीं, जीत का समीकरण’ वाली रणनीति पर जोर दिया जा रहा है।
2027 में अखिलेश होंगे गठबंधन का चेहरा
लोकसभा चुनाव 2024 और विधानसभा चुनाव 2027 की रणनीति में बड़ा अंतर माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव के दौरान इंडिया ब्लॉक की उत्तर प्रदेश में रणनीति में राहुल गांधी की भूमिका प्रमुख थी। वहीं विधानसभा चुनाव में सपा का मानना है कि राज्य की राजनीति में अखिलेश यादव को केंद्र में रखकर चुनावी अभियान चलाया जाना चाहिए। सपा नेता उदयवीर सिंह के मुताबिक किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी, इसका अंतिम फैसला पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और गठबंधन स्तर पर होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव की परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं।
कांग्रेस की ओर से भी गठबंधन को लेकर सकारात्मक संकेत दिए जा रहे हैं। पार्टी के सह प्रभारी श्याम कुमार दौलत के मुताबिक उत्तर प्रदेश में गठबंधन तय है और अंतिम निर्णय शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर होगा।
2017 के अनुभव से सबक लेना चाहती है सपा
सपा द्वारा कांग्रेस को अपेक्षाकृत कम सीटें देने के पीछे 2017 के विधानसभा चुनाव का अनुभव भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। 2017 में सपा और कांग्रेस ने गठबंधन किया था। उस समय कांग्रेस के हिस्से में 105 सीटें आई थीं। बाद में कुछ सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवार आमने-सामने आ गए और कांग्रेस ने कुल 114 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि सपा करीब 311 सीटों पर मैदान में उतरी। कांग्रेस को उस चुनाव में केवल सात सीटों पर जीत मिली थी। सपा अब उसी अनुभव को दोहराने के पक्ष में नहीं दिखाई देती। पार्टी का मानना है कि अधिक सीटें देकर यदि उन पर जीत की संभावना कमजोर रहती है तो गठबंधन को अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा।

PDA रणनीति भी सपा के लिए महत्वपूर्ण
सपा 2027 का चुनाव PDA—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत आधार बनाकर लड़ने की तैयारी में है। पार्टी की रणनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व को विशेष महत्व दिया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक सपा करीब 100 सीटों पर दलित और आदिवासी समुदाय से उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर भी विचार कर रही है। ये संख्या आरक्षित सीटों से अलग बताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो सपा को अधिक विधानसभा सीटों पर खुद उम्मीदवार उतारने की जरूरत होगी।
यही कारण है कि पार्टी कांग्रेस को बड़ी संख्या में सीटें देने के बजाय अपने हिस्से में अधिक सीटें रखना चाहती है।
बिहार के अनुभव से भी यूपी में सतर्कता
सपा की रणनीति में बिहार विधानसभा चुनाव से जुड़े अनुभवों को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सीट बंटवारे में देरी और कमजोर चुनावी आधार वाले क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारने से गठबंधन को नुकसान होने की बात सपा के रणनीतिकारों के बीच चर्चा का विषय रही है। उत्तर प्रदेश में सपा समय रहते सीट बंटवारे को अंतिम रूप देकर चुनावी तैयारी शुरू करना चाहती है। पार्टी का मानना है कि उम्मीदवारों के चयन, बूथ स्तर के संगठन और चुनावी रणनीति के लिए पर्याप्त समय मिलना जरूरी है।
सपा ने करीब 150 उम्मीदवारों के नाम किए तैयार?
सूत्रों के अनुसार सपा ने विधानसभा चुनाव के लिए करीब 150 उम्मीदवारों के नाम पर अंदरूनी स्तर पर काम पूरा कर लिया है। इनमें 2022 विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर जीतने वाले करीब 100 नाम शामिल बताए जा रहे हैं, जबकि लगभग 45 नए चेहरों पर भी विचार किया गया है। हालांकि पार्टी की ओर से अभी इन नामों की आधिकारिक सूची जारी नहीं की गई है। उम्मीदवारों के नाम और सीटों पर अंतिम फैसला गठबंधन की स्थिति और संगठनात्मक समीक्षा के बाद लिया जाएगा।
कांग्रेस के लिए गठबंधन क्यों जरूरी?
कांग्रेस के सामने भी उत्तर प्रदेश में बड़ा राजनीतिक फैसला है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा था और उसे केवल दो विधानसभा सीटों पर जीत मिली थी। इसके विपरीत 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में छह लोकसभा सीटें जीतीं और माना गया कि सपा के साथ गठबंधन ने उसके प्रदर्शन को मजबूत किया। ऐसे में कांग्रेस के लिए अकेले विधानसभा चुनाव लड़ना बड़ा जोखिम माना जा रहा है। पार्टी के प्रदेश संगठन के कुछ नेता भले ही अधिक सीटों की मांग कर रहे हों, लेकिन अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व और गठबंधन के शीर्ष नेताओं के स्तर पर होने की संभावना है।
दूसरी तरफ सपा को भी कांग्रेस की जरूरत है। विपक्षी वोटों का बिखराव रोकने, भाजपा के खिलाफ सीधा मुकाबला बनाने और अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच गठबंधन का संदेश मजबूत करने के लिए कांग्रेस के साथ तालमेल सपा के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
सितंबर में हो सकती है निर्णायक बातचीत
इंडिया ब्लॉक की पिछली महत्वपूर्ण बैठक 8 जून को दिल्ली में हुई थी। उस दौरान गठबंधन के नेताओं के बीच नियमित अंतराल पर बैठक करने की बात सामने आई थी। अगस्त में संसद सत्र और राजनीतिक गतिविधियों के चलते प्रस्तावित बैठक नहीं हो सकी। अब सितंबर में सीट बंटवारे को लेकर बातचीत तेज होने की संभावना है। हालांकि 328-75 का फॉर्मूला फिलहाल अंतिम नहीं है, लेकिन इससे दोनों दलों की शुरुआती रणनीति का संकेत जरूर मिलता है।
2027 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 403 सीटों पर मुकाबला बेहद महत्वपूर्ण होगा। ऐसे में सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारा केवल संख्या का सवाल नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि गठबंधन किन क्षेत्रों में सीधे मुकाबले की रणनीति अपनाता है और किन सीटों पर सहयोगी दल को प्राथमिकता देता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस 200 सीटों के अपने दावे से कितना पीछे हटती है और सपा 75 सीटों के फॉर्मूले पर कितना समझौता करती है। अंतिम तस्वीर सितंबर में होने वाली बातचीत के बाद ही साफ होने की उम्मीद है।



