Trading Newsउत्तर प्रदेशटॉप न्यूजताजातरीन

Breaking News : विभाजन की पीड़ा से एकता के संकल्प तक, 1947 के दर्द, विस्थापन और राष्ट्र निर्माण की अनकही दास्तान, विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर विशेष, विभाजन केवल जमीन का बंटवारा नहीं था, ‘फूट डालो और राज करो’ की विरासत पर सवाल, विभाजन से केवल ईंट पत्थर के मकान नहीं छूटे, बल्कि हमारी सभ्यता की आत्मा बिखर गई : यूपी संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह

यूपी के संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने कहां विभाजन को केवल भारत और पाकिस्तान के बीच खींची गई एक राजनीतिक रेखा के रूप में देखना उस दौर की वास्तविक पीड़ा को सीमित कर देना होगा। इस विभाजन ने उन परिवारों को भी अलग कर दिया, जो पीढ़ियों से एक-दूसरे के साथ रहते आए थे। घर, दुकान, खेत, कारोबार और सामाजिक रिश्ते अचानक छूट गए। लाखों लोग अपने ही शहरों और गांवों में असुरक्षित महसूस करने लगे और उन्हें अनजान स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा। विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई।

लखनऊ, रफ़्तार टूडे। जब भी हम वर्ष 1947 के उस दौर को याद करते हैं, तो इतिहास का एक ऐसा अध्याय सामने आता है, जिसकी पीड़ा आज भी करोड़ों लोगों की स्मृतियों में जीवित है। भारत की स्वतंत्रता के साथ हुआ विभाजन केवल राजनीतिक सीमाओं का निर्धारण नहीं था, बल्कि इसने लाखों परिवारों के जीवन, उनकी पहचान, संपत्ति और सामाजिक ताने-बाने को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। विभाजन की त्रासदी में असंख्य लोगों ने अपना घर-बार छोड़ा, अपनों को खोया और अनिश्चित भविष्य के बीच नए सिरे से जीवन शुरू किया।

इसी दर्द, संघर्ष और विस्थापन की स्मृतियों को समझने तथा आने वाली पीढ़ियों को इतिहास के इस अध्याय से परिचित कराने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने वर्ष 2021 में प्रत्येक वर्ष 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की। इसका उद्देश्य केवल अतीत के घावों को कुरेदना नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के संघर्ष और बलिदान को स्मरण करना है, जिन्होंने विभाजन की भयावह परिस्थितियों के बावजूद अपने जीवन को दोबारा खड़ा किया।

विभाजन केवल जमीन का बंटवारा नहीं था

यूपी के संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने कहां विभाजन को केवल भारत और पाकिस्तान के बीच खींची गई एक राजनीतिक रेखा के रूप में देखना उस दौर की वास्तविक पीड़ा को सीमित कर देना होगा। इस विभाजन ने उन परिवारों को भी अलग कर दिया, जो पीढ़ियों से एक-दूसरे के साथ रहते आए थे। घर, दुकान, खेत, कारोबार और सामाजिक रिश्ते अचानक छूट गए। लाखों लोग अपने ही शहरों और गांवों में असुरक्षित महसूस करने लगे और उन्हें अनजान स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा। विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई। अनेक परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया और बड़ी संख्या में लोगों को शरणार्थी शिविरों में जीवन बिताना पड़ा। इतिहास के विभिन्न आकलनों में विस्थापित लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े मानवीय विस्थापनों में से एक था।

‘फूट डालो और राज करो’ की विरासत पर सवाल

इस त्रासदी के कारणों पर चर्चा करते हुए उस दौर की औपनिवेशिक राजनीति, साम्प्रदायिक तनाव और राजनीतिक परिस्थितियों को समझना जरूरी है। लंबे समय तक अपनाई गई ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति, सामुदायिक आधार पर बढ़ती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों ने हालात को जटिल बनाया। 1905 के बंग-भंग और उसके बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए यह सवाल भी उठता है कि क्या समय रहते अधिक प्रभावी राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवाद से परिस्थितियों को अलग दिशा दी जा सकती थी। हालांकि इतिहास के ऐसे प्रश्नों का मूल्यांकन तत्कालीन परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों के संदर्भ में ही किया जाना चाहिए।

सिंध, पंजाब, बंगाल से लेकर देश के दूसरे हिस्सों तक पड़ा असर

विभाजन का प्रभाव केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा। पंजाब और बंगाल के साथ सिंध तथा अन्य क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा। परिवारों के बिखरने और सामाजिक रिश्तों के टूटने का दर्द लंबे समय तक लोगों के जीवन का हिस्सा बना रहा। कई लोगों ने अपना सब कुछ गंवाने के बावजूद भारत आकर नए सिरे से शुरुआत की। शरणार्थियों के सामने रोजगार, आवास और सुरक्षा जैसी गंभीर चुनौतियां थीं, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत, उद्यमशीलता और जीवटता के बल पर न केवल अपना जीवन दोबारा खड़ा किया, बल्कि देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

विस्थापितों का संघर्ष बना राष्ट्र निर्माण की ताकत

विभाजन के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक लाखों विस्थापित लोगों का पुनर्वास था। सीमित संसाधनों के बावजूद देश ने पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की। अनेक परिवारों ने कठिन परिस्थितियों में जीवन की नई शुरुआत की। इन परिवारों की कहानी केवल पीड़ा की कहानी नहीं है। यह संघर्ष, साहस, आत्मविश्वास और पुनर्निर्माण की कहानी भी है। जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया था, उन्होंने अपने परिश्रम से कारोबार खड़े किए, नई बस्तियां बसाईं और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य तैयार किया।

स्मृति दिवस का उद्देश्य पीढ़ियों को इतिहास से जोड़ना

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि समय के साथ उस दौर को प्रत्यक्ष रूप से देखने वाली पीढ़ी कम होती जा रही है। ऐसे में जरूरी है कि नई पीढ़ी इतिहास को केवल किताबों में पढ़े ही नहीं, बल्कि उसके मानवीय पक्ष को भी समझे। इस दिन उन लोगों को श्रद्धांजलि दी जाती है, जिन्होंने विभाजन की विभीषिका में अपने परिजनों, घर और संपत्ति को खोया। साथ ही यह संदेश भी देने की आवश्यकता है कि समाज को ऐसी परिस्थितियों से बचाने के लिए आपसी विश्वास, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना जरूरी है।

दर्द से सीख लेकर एकता का संकल्प

विभाजन की त्रासदी हमें यह सिखाती है कि सामाजिक विभाजन और अविश्वास की कीमत बहुत भारी हो सकती है। इतिहास को याद करने का उद्देश्य किसी समुदाय के प्रति नफरत पैदा करना नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को समझना होना चाहिए, जिनसे समाज को भारी मानवीय नुकसान उठाना पड़ा। आज जब भारत विकास और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब विभाजन की स्मृतियां हमें अपने साझा इतिहास और राष्ट्रीय एकता की अहमियत का एहसास कराती हैं। देश की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस इसलिए केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए संकल्प लेने का दिन है—ऐसा भारत बनाने का संकल्प, जहां विभाजनकारी ताकतों के लिए कोई स्थान न हो और विविधता के बीच एकता देश की सबसे बड़ी शक्ति बनी रहे।

लेखक: धर्मपाल सिंह, प्रदेश संगठन महामंत्री, भाजपा, उत्तर प्रदेश

रफ़्तार टूडे की न्यूज

Raftar Today
Raftar Today

Related Articles

Back to top button