Galgotia University News : “अब फल खुद बताएंगे—पके हैं या नहीं!”, गलगोटिया यूनिवर्सिटी को IIT बॉम्बे से 42 लाख का बड़ा रिसर्च ग्रांट, आम-तरबूज के लिए बनेगा स्मार्ट डिटेक्टर, कृषि और टेक्नोलॉजी का अनोखा संगम, कैसे काम करेगा यह इंटेलिजेंट सिस्टम?, अब “स्मार्ट खेती” की ओर बढ़ता भारत

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। टेक्नोलॉजी और कृषि के संगम की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। ग्रेटर नोएडा स्थित Galgotias University को देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT Bombay से 42 लाख रुपये का शोध अनुदान प्राप्त हुआ है।
यह अनुदान “टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट प्रोग्राम” के तहत “आम और तरबूज के लिए इंटेलिजेंट रिपनिंग डिटेक्टर” विकसित करने के लिए दिया गया है, जो भविष्य में फलों की गुणवत्ता जांचने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है।
कृषि और टेक्नोलॉजी का अनोखा संगम
यह परियोजना केवल एक शोध नहीं, बल्कि किसानों, व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ी राहत साबित हो सकती है।
इस प्रोजेक्ट के तहत एक ऐसा स्मार्ट, पोर्टेबल और किफायती डिवाइस तैयार किया जाएगा, जो आम और तरबूज जैसे फलों की वास्तविक पकने की अवस्था का पता लगाएगा।
खास बात यह है कि यह तकनीक कृत्रिम रूप से पकाए गए फलों की पहचान भी कर सकेगी, जिससे बाजार में मिल रहे मिलावटी या केमिकल से पकाए गए फलों पर लगाम लगाई जा सकेगी।
IIT बॉम्बे के टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब का सहयोग
इस शोध परियोजना को Technology Innovation Hub for IoT IIT Bombay (टीआईएच) द्वारा वित्तपोषित किया जा रहा है।
यह हब एक गैर-लाभकारी सेक्शन-8 कंपनी है, जो भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत संचालित “नेशनल मिशन ऑन इंटरडिसिप्लिनरी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स” के अंतर्गत कार्य करता है।
इस मिशन का उद्देश्य देश में अत्याधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देना और विभिन्न क्षेत्रों में नवाचार को गति देना है।
कैसे काम करेगा यह इंटेलिजेंट सिस्टम?
इस परियोजना की सबसे खास बात इसकी तकनीक है।
यह सिस्टम सेंसर-आधारित तकनीक और इंट्रिंसिक इम्पीडेंस सेंसिंग (Intrinsic Impedance Sensing) का उपयोग करेगा, जिससे फलों की आंतरिक स्थिति का विश्लेषण बिना किसी नुकसान के किया जा सकेगा।
इसका मतलब है कि फल को काटे या खराब किए बिना ही उसकी गुणवत्ता और पकने की स्थिति का सटीक पता लगाया जा सकेगा।
यह तकनीक विभिन्न विकास चरणों में फलों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने में भी सक्षम होगी।
डॉ. अग्निव तापदार के नेतृत्व में होगा शोध
इस महत्वाकांक्षी परियोजना का नेतृत्व Dr. Agniva Tapadar कर रहे हैं, जो गलगोटिया विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।
उन्होंने बताया कि यह परियोजना कृषि, सेंसिंग तकनीक और इंटेलिजेंट सिस्टम्स के संगम पर आधारित है और इसका उद्देश्य व्यावहारिक और उपयोगी समाधान विकसित करना है।
किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को मिलेगा फायदा
इस तकनीक के आने से किसानों को अपनी फसल की गुणवत्ता का सही मूल्यांकन करने में मदद मिलेगी, जिससे उन्हें बेहतर कीमत मिल सकेगी।
वहीं, उपभोक्ताओं को भी शुद्ध और प्राकृतिक रूप से पके फल मिलेंगे, जिससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम कम होंगे।
यह पहल खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता नियंत्रण के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकती है।
राष्ट्रीय मिशन के अनुरूप बड़ा कदम
यह परियोजना भारत सरकार के National Mission on Interdisciplinary Cyber-Physical Systems के उद्देश्यों के अनुरूप है, जिसका लक्ष्य तकनीक के माध्यम से देश को आत्मनिर्भर और नवाचार में अग्रणी बनाना है।
इस तरह के प्रोजेक्ट्स भारत को वैश्विक स्तर पर रिसर्च और इनोवेशन के क्षेत्र में मजबूत स्थिति दिलाने में मदद करेंगे।
अब “स्मार्ट खेती” की ओर बढ़ता भारत
गलगोटिया यूनिवर्सिटी को मिला यह 42 लाख रुपये का अनुदान केवल एक संस्थान की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत में स्मार्ट एग्रीकल्चर की दिशा में एक बड़ा कदम है।
जब यह इंटेलिजेंट रिपनिंग डिटेक्टर बाजार में आएगा, तो यह किसानों, व्यापारियों और आम लोगों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
यानी आने वाले समय में फल खरीदते वक्त “आंखों के भरोसे” नहीं, बल्कि “टेक्नोलॉजी के भरोसे” फैसला लिया जाएगा।



