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Noida Authority News : कैलेंडर में गिटार, सिस्टम में सियासत!, नोएडा के पंचांग से उठे सवालों ने खोल दी अफसरशाही की अंदरूनी कहानी, शौक या संदेश?, कैलेंडर भी बोलते हैं

नोएडा, रफ़्तार टूडे। कभी-कभी एक साधारण-सी तस्वीर, एक मामूली-सा कैलेंडर और एक व्यक्तिगत शौक पूरे सिस्टम को आईना दिखा देता है। नोएडा मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (NMRC) के इस वर्ष के पंचांग पर छपी एक तस्वीर ने ऐसा ही तूफान खड़ा कर दिया है। तस्वीर में नोएडा प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) डॉ. लोकेश एम गिटार बजाते हुए दिखाई दे रहे हैं। पहली नज़र में यह एक सहज, मानवीय और प्रेरणादायक चित्र लग सकता है, लेकिन मौजूदा हालात में इस तस्वीर ने कई सवाल, बहस और आरोपों को जन्म दे दिया।
दरअसल, पिछले कुछ महीनों से नोएडा गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। वायु प्रदूषण का खतरनाक स्तर, इंदौर में हुए दूषित जल कांड के बाद पेयजल की गुणवत्ता पर उठते सवाल, शहर की बुनियादी सुविधाओं को लेकर जनता की चिंता—इन सबके बीच प्राधिकरण के मुखिया की एक “मस्त मुद्रा” में तस्वीर सामने आना कुछ लोगों को अखर गया। सोशल मीडिया पर तो मानो आग लग गई। तुलना तक कर दी गई उस ऐतिहासिक प्रसंग से, जब रोम जल रहा था और सम्राट नीरो बंसी बजा रहा था।


शौक या संदेश?
यह सवाल भी उठा कि क्या डॉ. लोकेश एम वास्तव में गिटार बजाने का शौक रखते हैं? इस पर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई। लेकिन यह भी सच है कि किसी अधिकारी का संगीत, कला या किसी वाद्ययंत्र में रुचि रखना न तो अपराध है और न ही असंवेदनशीलता का प्रमाण। बल्कि कई बार ऐसे शौक व्यक्ति के संतुलित, शांत और मानवीय पक्ष को दर्शाते हैं।
समस्या तस्वीर से ज्यादा उसके “समय” और “संदेश” को लेकर खड़ी हुई। आलोचकों का कहना है कि जब शहर पर्यावरण और जल संकट जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा हो, तब संस्थान के कैलेंडर में प्राथमिकताओं, योजनाओं और लक्ष्यों को दर्शाना ज्यादा उपयुक्त होता।


कैलेंडर भी बोलते हैं
इसी संदर्भ में यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) का उदाहरण सामने आया। यीडा के CEO राकेश कुमार सिंह ने इस वर्ष के कैलेंडर को विशेष रुचि लेकर तैयार कराया, जिसमें हर पन्ने पर वर्षभर में हासिल किए जाने वाले लक्ष्य, परियोजनाएं और योजनाएं प्रदर्शित की गई हैं। संदेश साफ है—कैलेंडर सिर्फ तारीखें नहीं बताते, वे संस्थान की दिशा और प्राथमिकताओं को भी दर्शाते हैं।
हालांकि, यह भी सच है कि किसी कैलेंडर पर संस्थान प्रमुख की तस्वीर छपना कोई नई या असामान्य बात नहीं है। देश-प्रदेश के कई सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थानों में ऐसा होता रहा है। सवाल यह है कि क्या इसे जानबूझकर विवाद का रूप दिया गया?

अंदरूनी राजनीति की परतें
सूत्रों की मानें तो यह मामला केवल एक तस्वीर तक सीमित नहीं है। नोएडा प्राधिकरण और NMRC के भीतर लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान और अफसरशाही की राजनीति भी इस विवाद की पृष्ठभूमि में बताई जा रही है। खासतौर पर आईएएस अधिकारी महेंद्र प्रसाद का नाम चर्चा में आया, जो नोएडा प्राधिकरण में विशेष कार्याधिकारी (OSD) होने के साथ-साथ NMRC के कार्यकारी निदेशक भी थे।
प्राधिकरण और NMRC के गलियारों में यह चर्चा आम थी कि महेंद्र प्रसाद का प्रभाव काफी बढ़ गया था और वे कई फैसलों में निर्णायक भूमिका निभा रहे थे। कुछ अफसरों को यह रास नहीं आ रहा था। ऐसे में कैलेंडर पर CEO की गिटार बजाती तस्वीर को “गलत समय पर गलत संदेश” बताकर उछाल दिया गया।


अंधे के हाथ बटेर
कहते हैं न, जब मौका मिलता है तो विरोधी पूरी ताकत से वार करते हैं। यह तस्वीर भी कुछ लोगों के लिए “अंधे के हाथ बटेर” साबित हुई। सोशल मीडिया के दुरुपयोग और अफवाहों के बीच मामला इतना बढ़ा कि प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई हो गई। नतीजा यह रहा कि आईएएस महेंद्र प्रसाद को दोनों संस्थानों के पदों से हटाकर प्रतीक्षारत कर दिया गया, और CEO डॉ. लोकेश एम को भी भविष्य के लिए एक कड़ा, मौन संदेश दे दिया गया।


सबक क्या है?
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रशासन में प्रतीकों, तस्वीरों और संदेशों की भी अपनी राजनीति होती है। कभी-कभी एक साधारण-सी चीज भी बड़े बदलाव का कारण बन जाती है। सवाल यह नहीं कि गिटार बजाना सही है या गलत, बल्कि यह है कि सिस्टम में पारदर्शिता, प्राथमिकताएं और संवाद कितना स्पष्ट है।
नोएडा के नागरिक अब यह उम्मीद कर रहे हैं कि कैलेंडर की तस्वीरों से ज्यादा शहर की असल तस्वीर बदले—जहां हवा साफ हो, पानी शुद्ध हो और विकास की धुन सही सुर में बजे।

रफ़्तार टूडे की न्यूज
Raftar Today
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