New Noida Authority News : सर्किल रेट अटके, मुआवजा अटका, अधिग्रहण भी लटका!, न्यू नोएडा की नींव लटकी!, भूमि अधिग्रहण के पेंच में फंसा न्यू नोएडा मास्टरप्लान, किसानों की सहमति से पहले तय होनी है मुआवजा दर

न्यू नोएडा, रफ्तार टुडे।
यूपी सरकार द्वारा महत्वाकांक्षी “न्यू नोएडा प्रोजेक्ट” की घोषणा के बाद जिस रफ्तार से विकास की उम्मीदें बढ़ीं, अब वहीं रफ्तार प्रशासनिक उलझनों में थमती नजर आ रही है।
गौतमबुद्ध नगर और बुलंदशहर जिलों में फैले न्यू नोएडा के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया सिर्फ एक वजह से अटक गई है — नए सर्किल रेट लागू नहीं हुए हैं! दो महीने पहले तय हुए ये रेट अभी तक आधिकारिक रूप से लागू नहीं हुए, जिससे किसानों को मिलने वाली मुआवजा दरों का निर्धारण अधर में है।
सर्किल रेट अटका, मुआवजा अटका, अधिग्रहण भी लटका!
दरअसल, नोएडा प्राधिकरण को अक्टूबर 2024 में मिले “न्यू नोएडा” के मास्टरप्लान की जिम्मेदारी के तहत करीब 20,911 हेक्टेयर भूमि पर एक नया स्मार्ट शहर बसाया जाना है। इसके लिए प्राधिकरण ने ₹1000 करोड़ का बजट भी स्वीकृत कर दिया है, लेकिन जमीन अधिग्रहण की शुरुआत तक नहीं हो पाई है, क्योंकि मुआवजे की दरें ही तय नहीं हो सकीं।
मनीष वर्मा, जिलाधिकारी, गौतमबुद्धनगर का कहना है:
“न्यू नोएडा में जमीन की दरें तय करने की प्रक्रिया चल रही है। जल्द ही मुआवजा राशि तय की जाएगी। इसके बाद अधिग्रहण की प्रक्रिया प्रारंभ होगी।”
क्या है मामला सर्किल रेट का?
सर्किल रेट यानी सरकारी मूल्यांकन दरें वो आधार होती हैं, जिनके अनुसार मुआवजे की राशि निर्धारित की जाती है।
हालांकि गौतमबुद्ध नगर में दो महीने पहले नए सर्किल रेट तय हो चुके हैं, लेकिन राजस्व विभाग की अंतिम स्वीकृति न होने के कारण ये अभी लागू नहीं हो सके। इसी कारण, प्राधिकरण यह तय नहीं कर पा रहा कि किस गांव के किसानों को कितना मुआवजा दिया जाए।
किसानों की मांग – “हमें नोएडा जितना मुआवजा चाहिए!”
न्यू नोएडा के पहले चरण में जिन 15 गांवों की जमीन ली जानी है, उनमें ज्यादातर किसान नोएडा के बराबर मुआवजा (₹5400/वर्ग मीटर) की मांग कर रहे हैं।
जबकि सिकंदराबाद क्षेत्र में फिलहाल अधिकतम मुआवजा दर ₹1700/वर्ग मीटर तक है, जो किसानों को नाकाफी लग रहा है।
किसानों का कहना है:
“हम अपनी पुश्तैनी जमीन दे रहे हैं। अगर नोएडा जैसी दरें नहीं मिलतीं, तो हम अधिग्रहण के लिए जमीन नहीं देंगे!”
प्राधिकरण की कोशिश: आपसी सहमति से जमीन खरीदने का प्रयास
नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी मानते हैं कि संपूर्ण जमीन अधिग्रहण किसानों की सहमति के बिना नहीं किया जा सकता।
इसीलिए गांव-गांव जाकर बैठकें, पंचायतें और व्यक्तिगत संवाद किए जा रहे हैं। हर गांव में करीब 200 किसान परिवार हैं, जिनसे व्यक्तिगत रूप से बातचीत की जा रही है।
प्राधिकरण की मंशा “नो फोर्स, ओनली कंसेंट” की नीति पर काम करने की है।
चार चरण में बसेगा न्यू नोएडा — जानिए कब कितना क्षेत्र होगा विकसित:
| अवधि | विकसित क्षेत्र (हेक्टेयर) |
|---|---|
| 2023-2027 | 3,165 हेक्टेयर |
| 2027-2032 | 3,798 हेक्टेयर |
| 2032-2037 | 5,908 हेक्टेयर |
| 2037-2041 | 8,230 हेक्टेयर |
अवैध कॉलोनियों की बाढ़: अभी बसना था शहर, पहले ही बनने लगे घर!
जब तक प्रशासन मुआवजा तय करने की प्रक्रिया में उलझा है, तब तक भूमाफिया जमीन पर कब्जा कर अवैध कॉलोनियों और वेयरहाउस बसा चुके हैं।
दादरी बायपास और पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के आसपास कई अवैध निर्माण हो चुके हैं।
कुछ जगहों पर तो जमीन को ‘आबादी’ दिखा कर नाजायज़ रजिस्ट्री भी हो रही है।
प्राधिकरण अब तक कोई “अतिक्रमण हटाओ दस्ता” भी गठित नहीं कर पाया, जिससे कुल अधिग्रहण योग्य भूमि का 25% हिस्सा कब्जे में बताया जा रहा है।
कहां फंसा है पेच?
- सर्किल रेट को मंजूरी नहीं मिली
- किसानों और प्राधिकरण के बीच मुआवजे को लेकर असहमति
- अवैध निर्माण रोकने की कोई पुख्ता कार्यवाही नहीं
- बुलंदशहर और गौतमबुद्ध नगर के प्रशासन के बीच समन्वय की कमी
क्या इस देरी का असर परियोजना की विश्वसनीयता पर पड़ेगा?
बिलकुल! न्यू नोएडा परियोजना को सरकार की “उद्यम मित्र” छवि के प्रतीक के तौर पर देखा जा रहा था। जेवर एयरपोर्ट, फिल्म सिटी, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब आदि प्रोजेक्ट्स की बैक-एंड कनेक्टिविटी इसी क्षेत्र से जुड़ी है।
अगर भूमि अधिग्रहण में इसी तरह की देरी होती रही, तो औद्योगिक निवेशकों का विश्वास डगमगा सकता है और प्रोजेक्ट की रफ्तार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
कब तक मिल सकती है मंजूरी?
सूत्रों के अनुसार, राजस्व परिषद और शासन स्तर पर सर्किल रेट की स्वीकृति जुलाई के दूसरे सप्ताह तक मिल सकती है, जिसके बाद प्राधिकरण प्रस्तावित मुआवजा दरों के साथ अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर सकेगा।
क्या कहते हैं क्षेत्रीय विशेषज्ञ?
शहरी योजना विशेषज्ञ डॉ. अनिल कुमार कहते हैं:
“न्यू नोएडा को बसाने के लिए जितनी जरूरी सड़कें और इंफ्रास्ट्रक्चर हैं, उससे कहीं ज्यादा जरूरी है ‘स्थानीय विश्वास’।
अगर मुआवजा पारदर्शिता और त्वरित संवाद से तय नहीं हुआ, तो यह प्रोजेक्ट सियासी नारों तक सिमट जाएगा।”
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