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Breaking News : ₹2.55 करोड़ का सपना या सुनियोजित साज़िश?, अमात्रा ग्रुप पर करोड़ों की धोखाधड़ी का आरोप, 'जिस फ्लैट के लिए दिए पैसे, वह प्रोजेक्ट में था ही नहीं'—एफआईआर दर्ज होने से रियल एस्टेट जगत में मचा हड़कंप, 2019 में किया था करोड़ों का निवेश, लग्जरी फ्लैट का दिया गया था सपना

गाजियाबाद, रफ़्तार टूडे। गाजियाबाद के रियल एस्टेट सेक्टर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। अमात्रा ग्रुप एवं एसबी लैंडकॉन प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटरों और निदेशकों के खिलाफ 2.55 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, धन के दुरुपयोग और जान से मारने की धमकी जैसे गंभीर आरोपों में वेव सिटी थाना, गाजियाबाद में प्राथमिकी दर्ज की गई है। शिकायत में दावा किया गया है कि जिस लग्जरी फ्लैट के नाम पर करोड़ों रुपये लिए गए, वह यूनिट बाद में परियोजना में मौजूद ही नहीं निकली। इस पूरे मामले ने रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता और निवेशकों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

2019 में किया था करोड़ों का निवेश, लग्जरी फ्लैट का दिया गया था सपना

एफआईआर के अनुसार शिकायतकर्ता आशीष पाठक, निवासी मुरादाबाद, ने वर्ष 2019 में एसबी लैंडकॉन प्राइवेट लिमिटेड (अमात्रा ग्रुप) की आवासीय परियोजना “अमात्रा क्रिस्टल” में एक प्रीमियम फ्लैट बुक कराया था। शिकायत के मुताबिक उन्हें टावर-एस1 की 21वीं मंजिल पर स्थित यूनिट संख्या-2104, लगभग 10,910 वर्ग फुट सुपर एरिया का फ्लैट आवंटित किया गया था।

शिकायतकर्ता का कहना है कि बुकिंग के दौरान उनकी मुलाकात कंपनी के निदेशक रुपेश अग्रवाल से हुई थी। जून-जुलाई 2019 के दौरान उन्होंने कुल 2 करोड़ 55 लाख रुपये का भुगतान किया। बाद में 30 मार्च 2020 को उक्त यूनिट का आवंटन उनके और उनकी माता ममता शर्मा के नाम स्थानांतरित कर दिया गया।

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दिसंबर 2022 तक कब्जे का वादा, फिर शुरू हुआ इंतजार

शिकायत के अनुसार कंपनी की ओर से आश्वासन दिया गया था कि दिसंबर 2022 तक फ्लैट का कब्जा दे दिया जाएगा। लेकिन निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी न तो निर्माण पूरा हुआ और न ही कब्जा मिला। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्होंने कई बार कंपनी के अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन हर बार उन्हें अलग-अलग कारण बताकर टाल दिया गया। एफआईआर में रुपेश अग्रवाल, उमेश कुमार गुप्ता, महेंद्र बंसल, मयंक बंसल और राजेश कुमार चोपड़ा के नाम का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया गया है कि इन सभी ने लगातार आश्वासन देकर समय बिताया, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं दिया।

‘शिकायत की तो जिंदा नहीं बचोगे’—एफआईआर में गंभीर आरोप

शिकायत में दावा किया गया है कि मार्च 2024 में जब आशीष पाठक परियोजना स्थल पर पहुंचे और अपने निवेश के संबंध में जवाब मांगा, तब कथित रूप से उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई।

एफआईआर के अनुसार शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनसे कहा गया कि यदि उन्होंने पुलिस या अन्य किसी एजेंसी में शिकायत की, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। साथ ही कथित रूप से यह भी कहा गया कि फ्लैट सरेंडर कर दें, बदले में 18 प्रतिशत ब्याज सहित धनराशि वापस कर दी जाएगी, लेकिन इस पूरे मामले को सार्वजनिक न करें।

किस्तों में लौटाए गए 95 लाख रुपये, फिर भी करोड़ों रुपये बाकी

शिकायतकर्ता का कहना है कि भय और दबाव के माहौल में उन्होंने अपने परिचित संजीव कुमार गर्ग को पूरी जानकारी दी। उनके प्रयासों के बाद कंपनी ने अगस्त 2024 से लेकर 19 फरवरी 2026 के बीच कुल 95 लाख रुपये लौटाए।एफआईआर में यह भी उल्लेख है कि संजीव कुमार गर्ग का भी कंपनी में लगभग 60 लाख रुपये का निवेश है और उनके साथ भी कथित रूप से धोखाधड़ी हुई है।

सबसे बड़ा खुलासा—जिस फ्लैट के लिए भुगतान किया, वह परियोजना में था ही नहीं

शिकायत के अनुसार 23 अप्रैल 2026 को आशीष पाठक, संजीव कुमार गर्ग और राजेश गर्ग परियोजना स्थल और कंपनी कार्यालय पहुंचे। वहां उन्हें कथित रूप से पता चला कि यूनिट संख्या-2104, जिसके लिए उन्होंने करोड़ों रुपये का भुगतान किया था, परियोजना में अस्तित्व में ही नहीं है।शिकायतकर्ता का आरोप है कि परियोजना के अन्य फ्लैट दूसरे खरीदारों को बेच दिए गए, जबकि उनकी जमा धनराशि का कथित रूप से दुरुपयोग किया गया।

एफआईआर की आशंका के बाद और रकम लौटाने का दावा

एफआईआर में यह भी कहा गया है कि पुलिस कार्रवाई की संभावना बनने के बाद कंपनी ने 29 अप्रैल 2026 को 25 लाख रुपये तथा 4 मई 2026 को 5 लाख रुपये और वापस किए। इसके बावजूद शिकायतकर्ता के अनुसार उनकी बड़ी धनराशि अभी भी बकाया है।

धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और धमकी के आरोप

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि कंपनी के निदेशकों और प्रमोटरों ने सुनियोजित तरीके से निवेशकों को भ्रमित किया, उनकी धनराशि का दुरुपयोग किया और विरोध करने पर धमकियां दीं। इन्हीं आरोपों के आधार पर वेव सिटी थाना, गाजियाबाद में प्राथमिकी दर्ज की गई है।

अब इस मामले में पुलिस जांच करेगी और जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय होगी। आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया और जांच के बाद ही होगा। संबंधित पक्ष का आधिकारिक जवाब या पक्ष सार्वजनिक होने पर उसे भी समाचार में प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए। रियल एस्टेट विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है कि किसी भी परियोजना में निवेश से पहले सभी दस्तावेज, स्वीकृतियां, यूनिट का अस्तित्व और परियोजना की वैधता की स्वतंत्र रूप से जांच अवश्य कर लेनी चाहिए।

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