Dadri News : सरकारी ज़मीन या भूमाफिया की जागीर?, दादरी तहसील में राजस्व रिकॉर्ड से गायब कर दी गई करोड़ों की भूमि, लिपिक–लेखपाल पर साजिश के आरोप, समाधान दिवस में मचा हड़कंप, मुख्यमंत्री के निर्देश और ज़मीनी हकीकत में टकराव

दादरी / ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। उत्तर प्रदेश सरकार जहां एक ओर सरकारी भूमि को सुरक्षित रखने और भूमाफियाओं पर शिकंजा कसने के लिए सख्त निर्देश जारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर दादरी तहसील से सामने आया मामला इन निर्देशों पर सवाल खड़े करता नजर आ रहा है। यहां एक लिपिक और क्षेत्रीय लेखपाल पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने सरकारी भूमि को जानबूझकर राजस्व अभिलेखों में दर्ज होने से रोका, ताकि भूमाफियाओं को लाभ पहुंचाया जा सके।यह गंभीर आरोप संपूर्ण समाधान दिवस के दौरान उस समय सामने आए, जब शिकायतकर्ता सुमित कुमार अग्रवाल ने उप जिलाधिकारी (न्यायिक) चारुल यादव के समक्ष लिखित शिकायत देकर पूरे मामले को उजागर किया। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि राजस्व ग्राम सोहरखा जहीदाबाद की राज्य सरकार की भूमि को निजी स्वामित्व में बनाए रखने के लिए तहसील स्तर पर सुनियोजित खेल खेला जा रहा है।
मुख्यमंत्री के निर्देश और ज़मीनी हकीकत में टकराव
प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि सरकारी भूमि पर किसी भी तरह का कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और भूमाफियाओं को संरक्षण देने वालों पर भी सख्त कार्रवाई होगी। इसके बावजूद दादरी तहसील में सामने आया यह मामला दर्शाता है कि राजस्व तंत्र के भीतर बैठे कुछ लोग ही सरकारी भूमि के सबसे बड़े दुश्मन बनते जा रहे हैं।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि तहसील दादरी में तैनात लिपिक नरेंद्र सिंह और क्षेत्रीय लेखपाल राजीव शर्मा की भूमाफिया मनीष वर्मा पुत्र गुलाब सिंह वर्मा से आपसी मिलीभगत है। इसी मिलीभगत के चलते सरकारी भूमि को आज तक सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं किया गया।
कौन-सी भूमि, कितना बड़ा खेल?
शिकायत के अनुसार मामला खसरा संख्या 819 और 847, राजस्व ग्राम सोहरखा जहीदाबाद से जुड़ा हुआ है। यह भूमि राज्य सरकार की है, लेकिन आरोप है कि इसे जानबूझकर सरकारी खाते में दर्ज नहीं किया जा रहा, ताकि इसे निजी भूमि के रूप में दिखाकर उसकी खरीद-फरोख्त की जा सके। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि यह भूमि राजस्व रिकॉर्ड में राज्य सरकार के नाम दर्ज हो जाती है, तो भूमाफियाओं की पूरी योजना ध्वस्त हो जाएगी। इसी कारण तहसील स्तर पर रिकॉर्ड से छेड़छाड़ और जानबूझकर विलंब किया जा रहा है।
जांच रिपोर्ट पहले ही बता चुकी है सच्चाई
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सच्चाई पहले ही प्रशासनिक जांच में सामने आ चुकी है। शिकायतकर्ता सुमित कुमार अग्रवाल के अनुसार—
20 जनवरी 2025 को
क्षेत्रीय लेखपाल राजीव शर्मा,
क्षेत्रीय लेखपाल मनवीर भाटी,
तथा क्षेत्रीय राजस्व निरीक्षक नरेश शर्मा
द्वारा संयुक्त जांच की गई थी।
इस जांच में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि खतौनी में खातेदार के रूप में दर्ज रामधन की भूमि वास्तव में राज्य सरकार की भूमि है और उसे सरकारी खाते में दर्ज किया जाना चाहिए। यह जांच रिपोर्ट संबंधित कार्यालय में प्रस्तुत भी की जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद आज तक न तो रामधन का नाम खतौनी से हटाया गया और न ही भूमि को सरकार के नाम दर्ज किया गया।
जब रिकॉर्ड बोले, फिर भी अमल क्यों नहीं?
यह सवाल अब प्रशासनिक गलियारों में गूंजने लगा है कि—
जब जांच रिपोर्ट स्पष्ट है
जब दस्तावेज मौजूद हैं
जब भूमि सरकारी सिद्ध हो चुकी है
तो फिर राजस्व रिकॉर्ड में संशोधन क्यों नहीं किया गया?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह कोई लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति है, जिसके तहत सरकारी भूमि को निजी हाथों में बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।
धमकी का गंभीर आरोप, प्रशासनिक संरक्षण पर सवाल
मामले ने उस समय और गंभीर मोड़ ले लिया, जब शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि क्षेत्रीय लेखपाल राजीव शर्मा ने उन्हें व्हाट्सएप कॉल के माध्यम से समाधान दिवस में शिकायत देने पर अंजाम भुगतने की धमकी दी।
यदि यह आरोप सही पाया जाता है, तो यह केवल भूमि घोटाले का मामला नहीं, बल्कि—
सरकारी अधिकारी द्वारा दबाव
शिकायतकर्ता को डराने
न्यायिक प्रक्रिया में बाधा
जैसे गंभीर अपराधों की श्रेणी में आएगा।
1981 से शुरू हुआ दस्तावेजी खेल
शिकायत पत्र में भूमि के इतिहास का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। बताया गया है कि—मूल खातेदार कटरा रामपाल पुत्र शिवचरण ने 23 दिसंबर 1981 को
अपना संपूर्ण भाग प्रगतिशील सहकारी कृषि समिति के पक्ष में बैनामा कर दिया था। इसके बाद उक्त भूमि का बैनामा देवेंद्र पुत्र हरशरण सिंह के पक्ष में हुआ।
बाद में रामधन सिंह द्वारा भूमि खरीदी गई।
वहीं, प्रगतिशील सहकारी समिति के नाम दर्ज भूमि को पहले ही राज्य सरकार के खाते में दर्ज किया जा चुका है।
इसके बावजूद त्रुटिवश या जानबूझकर खतौनी में रामधन का नाम खातेदार के रूप में दर्ज रह गया, जिसका फायदा अब भूमाफिया उठा रहे हैं।
त्रुटि नहीं, सुनियोजित साजिश?
शिकायतकर्ता का कहना है कि खतौनी में हुई इस तथाकथित “त्रुटि” को अब जानबूझकर सुधारा नहीं जा रहा। इसी का लाभ उठाकर भूमाफिया कॉलोनाइजर मनीष वर्मा द्वारा—रामधन के वारिसों से सरकारी भूमि की अवैध खरीद-फरोख्त की जा रही है, ताकि आगे इसे बेचकर मोटा मुनाफा कमाया जा सके।
एसडीएम (न्यायिक) ने दिए जांच के आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए उप जिलाधिकारी (न्यायिक) चारुल यादव ने इसे नजरअंदाज नहीं किया। उन्होंने— “सरकारी हित को ध्यान में रखते हुए
उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर
जांच कर आख्या प्रस्तुत करने”
के निर्देश तहसीलदार दादरी को दिए हैं।
अब यह जांच यह तय करेगी कि—
क्या लिपिक और लेखपाल दोषी हैं?
क्या भूमाफिया को संरक्षण मिला?
क्या सरकारी भूमि वापस सरकार के नाम दर्ज होगी?
जनहित बनाम निजी स्वार्थ
सरकारी भूमि पर कब्जा केवल राजस्व का मामला नहीं, बल्कि— जनता की संपत्ति
शासन की विश्वसनीयता
कानून के राज
और प्रशासनिक ईमानदारी
से जुड़ा विषय है।
अब दादरी तहसील का यह मामला प्रशासन के लिए एक लिटमस टेस्ट बन चुका है।
निगाहें अब जांच रिपोर्ट पर
क्या जांच निष्पक्ष होगी?
क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी?
या फिर यह मामला भी कागजों में दबकर रह जाएगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।
इस पर लेखपाल राजीव शर्मा के कहना है कि जिस मामले में न्यायालय द्वारा आदेश निर्गत किया गया हैं, उस पर कोई कथन नियमानुसार उचित नहीं हैं।



