Paramount Golf Foreste Society News : इको क्लब ने बच्चों के लिए आयोजित की अनोखी बायो-एंजाइम कार्यशाला, ‘ओली द ऑरेंज पील’ की कहानी ने जीता दिल, पर्यावरण संरक्षण की सीख, रसोई कचरे से ‘क्लीनर’ बनाने की कला सीखकर बच्चे बने छोटे इको-वारियर्स, बायो-एंजाइम क्या है? बच्चों को मिला ज्ञान + प्रैक्टिकल अनुभव

ग्रेटर नोएडा पैरामाउंट, रफ़्तार टुडे। पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली को बढ़ावा देने की दिशा में एक सराहनीय पहल करते हुए पी.जी.एफ. के इको-क्लब ने 16 नवंबर को बच्चों के लिए बायो-एंजाइम मेकिंग कार्यशाला का सफल आयोजन किया। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य युवा बच्चों को यह समझाना था कि रोजमर्रा के रसोई कचरे को किस तरह उपयोगी चीज़ों में बदला जा सकता है और प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना स्वच्छता बनाए रखी जा सकती है।
‘ओली द ऑरेंज पील’—कहानी से सीख, सीख से बदलाव
कार्यक्रम की शुरुआत एक बेहद इंटरैक्टिव और मजेदार स्टोरी सेशन “द जर्नी ऑफ ओली द ऑरेंज पील” से हुई।
इस कहानी के माध्यम से बच्चों को बताया गया कि कैसे एक साधारण सा संतरे का छिलका पर्यावरण के लिए उपयोगी बन सकता है। कहानी का उद्देश्य बच्चों में पर्यावरणीय जागरूकता और जिज्ञासा बढ़ाना था।
बच्चे कहानी सुनते समय इतने जुड़े दिखाई दिए कि हर मोड़ पर हँसी, उत्साह और सीख का माहौल बना रहा।
बायो-एंजाइम क्या है? बच्चों को मिला ज्ञान + प्रैक्टिकल अनुभव
कहानी के बाद बच्चों को बायो-एंजाइम की अवधारणा से रूबरू कराया गया।
उन्हें समझाया गया कि बायो-एंजाइम एक प्राकृतिक, रसायन-मुक्त क्लीनर होता है जो तीन चीज़ों से तैयार होता है साइट्रस के छिलके
गुड़
पानी
सरल प्रयोगों और मजेदार डेमो के माध्यम से बच्चों ने खुद अपने हाथों से बायो-एंजाइम की बोतलें तैयार कीं, जिन्हें वे घर लेकर गए। बच्चों में यह देखकर उत्साह था कि वे खुद पर्यावरण के अनुकूल चीज़ बना रहे हैं जिसे घर में उपयोग भी किया जा सकता है।
आयोजकों का संदेश — “छोटी उम्र से ही बच्चों में ग्रीन हैबिट्स जरूरी”
कार्यक्रम से जुड़े आयोजकों ने बताया कि ऐसी कार्यशालाएँ बच्चों को बहुत छोटी उम्र से ही प्रकृति-हितैषी जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं।
उन्होंने कहा “यदि बच्चे कचरे को उपयोगी वस्तु में बदलने का महत्व समझ जाएँ, तो भविष्य में स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण का निर्माण आसान हो जाता है।”
इस पहल से बच्चों में न सिर्फ जागरूकता बढ़ी, बल्कि उन्होंने इसे अपने परिवारों तक पहुंचाने की भी इच्छा जताई।
“कचरे को कुछ उपयोगी में बदलें”—संदेश लेकर लौटे नन्हे इको-चैम्प
कार्यशाला में शामिल हर बच्चा अपनी स्वयं-निर्मित बायो-एंजाइम की बोतल हाथ में लिए बेहद खुश दिखाई दिया।
इसके साथ ही वे एक मजबूत संदेश लेकर लौटे “कचरे को बेकार न फेंके, उसे उपयोगी बनाएं और पर्यावरण की रक्षा करें।”
यह संदेश इतना शक्तिशाली था कि कई बच्चों ने वहीं कहा कि अब वे घर जाकर भी यह प्रक्रिया दोहराएंगे और अपने परिवारों को भी समझाएंगे।
इको क्लब की अगली योजना — और भी इंटरैक्टिव कार्यक्रम आने वाले हैं
इको-क्लब ने घोषणा की कि वह पर्यावरण संरक्षण, कचरा प्रबंधन और सामुदायिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने के लिए आगे भी ऐसे इंटरैक्टिव सत्र आयोजित करता रहेगा। उद्देश्य है बच्चों में ग्रीन हैबिट्स विकसित करना
समुदाय को पर्यावरण-हितैषी पहल में शामिल करना
अपशिष्ट प्रबंधन के महत्व को घर-घर पहुँचाना
इस सफल कार्यक्रम ने यह साबित किया कि छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव की ओर ले जाते हैं।



