GBU University News : गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय को मिला अंतरराष्ट्रीय गौरव!, रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी बने स्वीडन के ‘एडजंक्ट प्रोफेसर’, हेल्थ रिसर्च में भारत का नाम रोशन, जापान से लेकर स्वीडन तक – अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका, जीबीयू में बनेगा नया रिसर्च सेंटर, HIV ट्रांसमिशन और COVID-19 पर शोध ने दिलाई थी चर्चा

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे। एक बार फिर गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (GBU) ने वैश्विक मंच पर भारत का परचम लहराया है। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और वरिष्ठ सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक (माइक्रोबायोलॉजिस्ट) डॉ. विश्वास त्रिपाठी को स्वीडन स्थित इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ एडवांस्ड मैटेरियल्स (IAAM) द्वारा “एडजंक्ट प्रोफेसर” के रूप में नामित किया गया है।
यह सम्मान उन्हें स्वास्थ्य अनुसंधान (Health Research) और क्लाइमेट-न्यूट्रल इनोवेशन के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए प्रदान किया गया है।
IAAM: दुनिया की अग्रणी वैज्ञानिक संस्था में भारतीय वैज्ञानिक की उपलब्धि
इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ एडवांस्ड मैटेरियल्स (IAAM) स्वीडन में स्थित एक प्रतिष्ठित वैश्विक संगठन है, जो विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देता है।
IAAM के सेक्रेटरी जनरल प्रोफेसर निकल स्टॉमेंट्ज ने डॉ. विश्वास त्रिपाठी को यह सम्मान प्रदान करते हुए उन्हें “फेलो ऑफ IAAM” के रूप में भी नामित किया।
इस सम्मान के साथ, डॉ. त्रिपाठी अब IAAM के नॉलेज इंटीग्रेशन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट वर्ल्ड लिंक प्रोग्राम का हिस्सा बन गए हैं, जिसके तहत वे यूरोप, अमेरिका और एशिया के कई अग्रणी शोध संस्थानों के साथ वैज्ञानिक सहयोग स्थापित करेंगे।
“एडजंक्ट प्रोफेसर” की उपाधि क्यों है खास?
IAAM द्वारा प्रदान की जाने वाली “एडजंक्ट प्रोफेसर” की उपाधि केवल उन वैज्ञानिकों को दी जाती है, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर हेल्थ रिसर्च, पर्यावरण संरक्षण और क्लाइमेट न्यूट्रल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया हो।
यह सम्मान दुनिया के चुनिंदा वैज्ञानिकों को ही मिलता है — और अब इस सूची में भारत के डॉ. विश्वास त्रिपाठी का नाम भी शामिल हो गया है।
यह उपलब्धि न केवल व्यक्तिगत गौरव है, बल्कि भारत के वैज्ञानिक समुदाय और गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय दोनों के लिए एक ऐतिहासिक पल है।
क्लाइमेट न्यूट्रल हेल्थ रिसर्च में नवाचार का नेतृत्व
डॉ. त्रिपाठी को विशेष रूप से “क्लाइमेट न्यूट्रल हेल्थ रिसर्च (Climate-Neutral Health Research)” के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया है।
उन्होंने अपने शोध में यह सिद्ध किया कि स्वास्थ्य सेवाओं में पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability) को शामिल करना आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उनका शोध कार्य इस बात पर केंद्रित है कि स्वास्थ्य प्रणाली किस प्रकार से कार्बन उत्सर्जन को कम करते हुए, रोग नियंत्रण और रोकथाम में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती है।
उनकी इस सोच ने वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में एक नई चर्चा को जन्म दिया है।
वैश्विक संस्थानों से जुड़ेगा भारत का नाम
IAAM के अंतर्गत, डॉ. त्रिपाठी अब स्वीडन, जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका और जापान जैसे देशों के प्रतिष्ठित शोध संस्थानों के साथ सहयोग कर सकेंगे।
वह “वर्ल्ड लिंक प्रोग्राम” के माध्यम से भारत में हेल्थ रिसर्च और एडवांस्ड मटेरियल्स के बीच समन्वय स्थापित करेंगे, जिससे भारतीय वैज्ञानिकों को अंतरराष्ट्रीय अवसर प्राप्त होंगे।
यह कदम भारत को ‘ग्लोबल हेल्थ रिसर्च नेटवर्क’ में और अधिक सशक्त स्थिति में लाने में सहायक होगा।
जीबीयू के लिए गर्व का क्षण
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (GBU), जो कि उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन एक प्रमुख राज्य विश्वविद्यालय है, लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। डॉ. त्रिपाठी की यह उपलब्धि GBU के लिए एक नई वैज्ञानिक पहचान लेकर आई है।
GBU के कुलपति (Vice Chancellor) और शिक्षकों ने डॉ. त्रिपाठी को इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा कि “यह गौरव न केवल विश्वविद्यालय के लिए, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश और देश के वैज्ञानिक समुदाय के लिए एक प्रेरणा है।”
HIV ट्रांसमिशन और COVID-19 पर शोध ने दिलाई थी चर्चा
डॉ. विश्वास त्रिपाठी लंबे समय से वायरल डिजीज रिसर्च से जुड़े रहे हैं। उन्होंने HIV ट्रांसमिशन और एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस पर उल्लेखनीय अध्ययन किए हैं।
कोविड-19 महामारी के दौरान उन्होंने “माइक्रोबियल रेस्पॉन्स एंड इम्यूनोलॉजिकल एडेप्टेशन” विषय पर शोध किया, जिसने न केवल भारत बल्कि विदेशी जर्नल्स में भी व्यापक चर्चा पाई।
महामारी के दौरान उनके द्वारा प्रकाशित कई शोध-पत्रों को वैश्विक मीडिया में सराहा गया। इसी कार्य के लिए उन्हें वर्ष 2023 में ‘रिसर्च एक्सीलेंस अवार्ड’ से भी नवाज़ा गया था।
जापान से लेकर स्वीडन तक – अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका
डॉ. त्रिपाठी को पिछले वर्ष जापान की नेशनल यूनिवर्सिटी द्वारा “विजिटिंग प्रोफेसर” के रूप में आमंत्रित किया गया था, जहाँ उन्होंने बायो-टेक्नोलॉजी और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्याख्यान दिए।
अब स्वीडन में IAAM से जुड़ने के बाद उनका अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और भी मजबूत हुआ है।
वे आने वाले समय में भारत-स्वीडन हेल्थ कोलैबोरेशन प्रोजेक्ट्स पर काम करेंगे, जो दोनों देशों के लिए वैज्ञानिक दृष्टि से लाभकारी साबित होंगे।
विज्ञान और समाज के बीच सेतु बनने का संकल्प
डॉ. त्रिपाठी का मानना है कि विज्ञान का असली उद्देश्य समाज की बेहतरी है।
उनका कहना है “शोध का मूल्य तभी है, जब उसका परिणाम मानवता के हित में इस्तेमाल किया जाए। पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं; हमें इन्हें अलग नहीं बल्कि पूरक रूप में देखना होगा।”
उनकी यह विचारधारा नई पीढ़ी के वैज्ञानिकों को प्रेरित कर रही है, जो अब पारंपरिक शोध से आगे बढ़कर सस्टेनेबल इनोवेशन की दिशा में कार्य करना चाहते हैं।
जीबीयू में बनेगा नया रिसर्च सेंटर
विश्वविद्यालय सूत्रों के अनुसार, डॉ. त्रिपाठी के नेतृत्व में जीबीयू में जल्द ही “क्लाइमेट-हेल्थ एंड सस्टेनेबल इनोवेशन सेंटर” की स्थापना की जा सकती है।
यह केंद्र भारत में स्वास्थ्य और पर्यावरण आधारित शोध का नया हब बनेगा, जहाँ देश-विदेश के वैज्ञानिक मिलकर कार्य करेंगे।
सहकर्मियों ने जताया गर्व
जीबीयू के प्रोफेसर डॉ. प्रवीण मिश्रा ने कहा “विश्वास त्रिपाठी जी की यह उपलब्धि हमारे विश्वविद्यालय के लिए ‘ग्लोबल अचीवमेंट’ है। उनकी मेहनत और समर्पण ने दिखा दिया कि भारतीय वैज्ञानिक किसी भी स्तर पर विश्व के बराबर हैं।”
वहीं छात्र संगठन के प्रतिनिधियों ने कहा कि इस उपलब्धि से युवाओं में शोध के प्रति नई ऊर्जा आई है।
भारत के वैज्ञानिक समुदाय के लिए प्रेरणा
डॉ. विश्वास त्रिपाठी की यह उपलब्धि भारतीय वैज्ञानिकों के लिए यह संदेश है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने के लिए नवाचार और निरंतरता सबसे बड़ा मंत्र है। उनका सफर यह साबित करता है कि यदि जुनून हो तो गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय जैसे संस्थान से भी विश्वस्तरीय पहचान पाई जा सकती है।
जीबीयू से निकला ‘ग्लोबल साइंस एंबेसडर’
डॉ. विश्वास त्रिपाठी की यह उपलब्धि न केवल जीबीयू बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का विषय है। उनकी नियुक्ति से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत अब सिर्फ विज्ञान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि विज्ञान का उत्पादक राष्ट्र बन रहा है।
यह सम्मान आने वाली पीढ़ी को यह संदेश देता है कि मेहनत, शोध और समर्पण से कोई भी भारतीय वैज्ञानिक दुनिया के शीर्ष मंचों पर स्थान बना सकता है।



