Yatharth Hospital News : 8 लाख रुपये खर्च, फिर भी नहीं बचा पैर! इलाज या लापरवाही?, ग्रेटर नोएडा के निजी अस्पताल पर गंभीर आरोप, पीड़ित परिवार ने डीएम से लगाई न्याय की गुहार, दुर्घटना में टूटा पैर, इलाज के भरोसे पहुंचे अस्पताल… दो साल बाद जिंदगी बदल गई; परिवार बोला– पहले लाखों रुपये लिए, फिर संक्रमण छिपाया, आखिरकार काटना पड़ा पैर

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। ग्रेटर नोएडा के एक निजी अस्पताल पर इलाज में कथित लापरवाही का गंभीर आरोप सामने आया है। दनकौर क्षेत्र के एक परिवार ने आरोप लगाया है कि सड़क दुर्घटना में घायल हुए मरीज के पैर का सही उपचार नहीं किया गया, जिसके कारण संक्रमण लगातार बढ़ता गया और आखिरकार डॉक्टरों को उसका पैर काटना पड़ा। पीड़ित परिवार का दावा है कि इलाज और ऑपरेशन के नाम पर करीब आठ लाख रुपये खर्च कराने के बावजूद मरीज का पैर नहीं बचाया जा सका। अब परिवार आर्थिक, मानसिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा है तथा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और मुआवजे की मांग को लेकर जिलाधिकारी (डीएम) से शिकायत की है।
यह मामला स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, निजी अस्पतालों की जवाबदेही और मरीजों के अधिकारों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और अस्पताल प्रबंधन की ओर से इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
दुर्घटना के बाद अस्पताल में कराया गया था भर्ती
दनकौर के गांव नवादा निवासी ओमवीर के अनुसार करीब दो वर्ष पहले सड़क दुर्घटना में उनके पैर में गंभीर फ्रैक्चर हो गया था। परिवार के लोग तत्काल उन्हें ग्रेटर नोएडा स्थित यथार्थ अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने ऑपरेशन कर पैर में रॉड डालने के बाद प्लास्टर चढ़ा दिया।
परिजनों का कहना है कि उन्हें विश्वास था कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के चलते मरीज जल्द स्वस्थ हो जाएगा। लेकिन ऑपरेशन के कुछ समय बाद ही पैर में लगातार दर्द, सूजन और अन्य परेशानियां शुरू हो गईं। परिवार का आरोप है कि अस्पताल ने इन लक्षणों को गंभीरता से नहीं लिया।

संक्रमण की जानकारी नहीं दी गई, ऐसा है आरोप
पीड़ित परिवार का आरोप है कि इलाज के दौरान पैर में संक्रमण (इन्फेक्शन) हो चुका था, लेकिन अस्पताल की ओर से इसकी जानकारी उन्हें नहीं दी गई। उनका कहना है कि डॉक्टरों ने मरीज को डिस्चार्ज कर दिया, जबकि संक्रमण लगातार बढ़ रहा था। जब दर्द असहनीय हो गया और स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तब परिवार मरीज को दूसरे अस्पताल लेकर गया। वहां जांच के दौरान संक्रमण की पुष्टि हुई। डॉक्टरों ने बताया कि संक्रमण काफी फैल चुका है और मरीज की जान बचाने के लिए पैर काटना ही एकमात्र विकल्प बचा है।
इलाज पर लाखों रुपये खर्च होने का दावा
ओमवीर का आरोप है कि अस्पताल में ऑपरेशन और इलाज के नाम पर करीब 7 लाख रुपये लिए गए। इसके बाद संक्रमण का हवाला देकर लगभग 1.20 लाख रुपये और जमा कराए गए। परिवार का कहना है कि इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बावजूद न तो मरीज का पैर बच पाया और न ही उन्हें समय रहते सही स्थिति से अवगत कराया गया। अब मरीज दिव्यांग हो चुका है, जिससे पूरे परिवार की आजीविका पर गंभीर असर पड़ा है।
परिवार के सामने खड़ा हुआ आर्थिक संकट
पीड़ित परिवार का कहना है कि मरीज परिवार का महत्वपूर्ण सदस्य था और उसके पैर कटने के बाद रोजगार और दैनिक जीवन दोनों प्रभावित हो गए हैं। इलाज में खर्च हुई भारी रकम के कारण परिवार पहले ही आर्थिक संकट में था, अब स्थायी दिव्यांगता ने उनकी परेशानियां और बढ़ा दी हैं।
परिजनों का कहना है कि अब उन्हें इलाज के साथ-साथ कृत्रिम पैर, पुनर्वास और भविष्य की चिकित्सा पर भी अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा।
जांच समिति बनी, लेकिन रिपोर्ट का इंतजार
परिवार का कहना है कि मामले की शिकायत पहले भी संबंधित अधिकारियों से की गई थी, जिसके बाद जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया था। हालांकि, उनका आरोप है कि लंबे समय बीत जाने के बावजूद आज तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। पीड़ित परिवार का कहना है कि यदि समय रहते जांच पूरी हो जाती और दोष तय हो जाता, तो उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद रहती।
डीएम से लगाई न्याय की गुहार
सोमवार को पीड़ित परिवार ने जिलाधिकारी से मिलकर पूरे मामले की लिखित शिकायत दी और निष्पक्ष जांच की मांग की। परिवार ने मांग की है कि— पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि चिकित्सा लापरवाही साबित होती है तो संबंधित अस्पताल और चिकित्सकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा उपलब्ध कराया जाए। भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग प्रभावी निगरानी व्यवस्था लागू करे।
अस्पताल का पक्ष सामने नहीं आया
इस मामले में अस्पताल प्रबंधन का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी। यदि अस्पताल प्रबंधन भविष्य में अपना पक्ष या स्पष्टीकरण जारी करता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
स्वास्थ्य सेवाओं पर फिर उठे सवाल
यह मामला एक बार फिर निजी अस्पतालों में उपचार की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर चर्चा का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि गंभीर मामलों में मरीज और परिजनों को उपचार की वास्तविक स्थिति, संभावित जोखिम और संक्रमण जैसी जटिलताओं की पूरी जानकारी समय पर देना चिकित्सकीय नैतिकता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।



