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Active Citizen Team News : "ग्रेटर नोएडा की जनता बोली चाहिए सरकारी अस्पताल, नहीं निजी लूट!", एक्टिव सिटीजन टीम ने प्राधिकरण को सौंपा ज्ञापन, निजी अस्पतालों की जगह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की मांग तेज़


ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे।
एक तरफ ग्रेटर नोएडा की सड़कों पर स्मार्ट सिटी के सपने संजोए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर आम नागरिकों का एक बड़ा तबका चिकित्सा के मोर्चे पर खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। इलाज के महंगे खर्च और सरकारी सुविधाओं की कमी ने अब एक्टिव सिटीजन टीम को आवाज़ उठाने पर मजबूर कर दिया है। मंगलवार को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को एक विशेष ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें स्पष्ट तौर पर मांग की गई कि आगामी अस्पताल प्लाट आवंटन स्कीम के तहत निजी कंपनियों को न देकर, सरकार खुद इन पर सरकारी अस्पताल बनाए।

ज्ञापन में उठाए गए अहम मुद्दे – जनता की आवाज़ को दिया दस्तावेज़ी रूप

ज्ञापन में कुछ बेहद ठोस और जमीनी तर्कों के साथ प्राधिकरण को यह सोचने पर मजबूर किया गया कि जब पहले से ही निजी अस्पतालों की भरमार है, तो नए प्लॉट भी उसी दिशा में क्यों जाएं? एक्टिव सिटीजन टीम ने जिन 5 मुख्य बिंदुओं को रेखांकित किया, वे निम्न हैं:

निजी और सरकारी अस्पतालों के अनुपात में बड़ा असंतुलन

गौतमबुद्धनगर जिले में निजी अस्पतालों की संख्या, सरकारी अस्पतालों की तुलना में कई गुना अधिक है। यह असंतुलन खासकर मध्यम वर्ग और निम्न आयवर्ग के लिए गंभीर संकट बन गया है, क्योंकि वे भारी भरकम मेडिकल खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं। सरकारी अस्पतालों की सीमित संख्या आम आदमी को मजबूर करती है या तो महंगा इलाज ले या फिर इलाज ही न ले।

महंगे प्लॉट = महंगे इलाज

ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने हाल ही में 4 अस्पताल प्लॉटों के लिए बोली प्रणाली (Bidding Process) निकाली है। इसमें निजी संस्थान उच्चतम बोली देकर ये प्लॉट खरीदेंगे, लेकिन बदले में यह बोझ मरीजों पर डाला जाएगा – यानी महंगे इलाज और ऊंची फीस।

जब पहले ही निजी अस्पतालों की भरमार है, तो फिर क्यों?

टीम ने प्रश्न उठाया कि जब क्षेत्र में पहले ही प्राइवेट अस्पतालों की संख्या सरकारी अस्पतालों की तुलना में कहीं अधिक है, तो फिर इन प्लॉटों पर एक बार फिर निजी निवेश क्यों? क्या प्राधिकरण का उद्देश्य केवल राजस्व अर्जन है या जनता की भलाई?

प्राधिकरण खुद बनाए और चलाए अस्पताल

ज्ञापन में एक रचनात्मक सुझाव यह दिया गया कि प्राधिकरण इन प्लॉटों को बेचने के बजाय सरकारी या ट्रस्ट मॉडल पर अस्पताल बनाकर किसी विश्वसनीय संस्था को संचालन के लिए दे सकता है। इससे इलाज की दरें नियंत्रित होंगी और सभी वर्गों को लाभ मिलेगा।

कम खर्च, ज्यादा फायदा – जनता और प्राधिकरण दोनों को

इस मॉडल से जहां आम जनता को सस्ता इलाज मिलेगा, वहीं प्राधिकरण को भी सतत आय का स्रोत मिलेगा। यह धन फिर अन्य जनहित योजनाओं में लगाया जा सकेगा।

नागरिकों की ओर से प्रतिनिधित्व करने वालों में ये रहे अग्रणी चेहरे

इस अभियान में भाग लेने वाले प्रमुख एक्टिव सिटिज़न थे –
मंजीत सिंह, साधना सिन्हा, हरेंद्र भाटी, आलोक सिंह, अनिल कसाना, रमेश प्रेमचंदानी और आशीष शर्मा।
इन सभी ने प्राधिकरण से गुज़ारिश की कि इस स्कीम को जनहित और जनसेवा के नजरिए से पुनः मूल्यांकन किया जाए।

जनता का दर्द – इलाज अब लग्ज़री नहीं, ज़रूरत है

साधना सिन्हा ने कहा – “आज के दौर में स्वास्थ्य सेवा मूलभूत अधिकार होना चाहिए। लेकिन हालत यह है कि आम आदमी इलाज का खर्च उठाने में पूरी तरह असहाय है। प्राधिकरण को चाहिए कि इस दिशा में जनभावनाओं को समझे और जनसेवा की प्राथमिकता रखे।”

हरेंद्र भाटी ने जोड़ा – “हम स्मार्ट सिटी की बात करते हैं, लेकिन अगर एक गरीब बुखार से भी तड़प जाए और इलाज न मिले, तो कैसी स्मार्टनेस? निजी अस्पतालों का कारोबार नहीं, इंसानियत चाहिए।”

क्यों जरूरी है सरकारी अस्पताल?

  • एक एमआरआई टेस्ट, जो सरकारी अस्पताल में ₹800 का है, वही निजी में ₹6000 तक जाता है।
  • सरकारी अस्पतालों में जन औषधि केंद्र, जांच में सब्सिडी और मुफ्त ऑपरेशन तक की सुविधा मिलती है।
  • गरीब और वंचित तबके के लिए यही एकमात्र आशा की किरण होती है।

ग्रेटर नोएडा में कहां-कहां हैं अभी सरकारी अस्पताल?

हालांकि ग्रेटर नोएडा में कुछ प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य केंद्र जैसे कि शारदा मेडिकल कॉलेज, राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (GIMS) और कुछ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन आबादी और क्षेत्रफल की दृष्टि से ये बेहद अपर्याप्त हैं।
गौरतलब है कि ग्रेटर नोएडा वेस्ट, यमुना प्राधिकरण क्षेत्र, न्यू ग्रेटर नोएडा और दादरी साइड में आज भी एक फुल-सर्विस सरकारी अस्पताल की भारी कमी है।

भविष्य की दिशा – उम्मीद बनाम हकीकत

ज्ञापन सौंपने के बाद एक्टिव सिटिज़न टीम ने बताया कि यदि प्राधिकरण इस मांग को गंभीरता से नहीं लेता, तो आगे जन आंदोलन की भी योजना बनाई जा सकती है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा सोशल मीडिया और स्थानीय जनसभाओं के माध्यम से जोर पकड़ सकता है।


निष्कर्ष – स्वास्थ्य अधिकार बनाम व्यवसाय

यह मसला केवल चार प्लॉट का नहीं, बल्कि लाखों नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य का है। सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसे शहर में रहना चाहते हैं, जहां अस्पताल भी केवल पैसे वालों की सुविधा बने? या फिर एक ऐसा शहर, जहां “स्वास्थ्य सेवा = जनसेवा” की भावना से काम हो?

ग्रेटर नोएडा के लोगों ने अपनी मांग स्पष्ट कर दी है –
“प्लॉट मत बेचिए, अस्पताल बनाइए!”


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