Big News : “कागजों में नंबर-1, लेकिन सड़कों पर कचरे का साम्राज्य! स्वच्छता सर्वेक्षण की चमक के पीछे छिपी हकीकत, समाज सेविका अंकिता राजपूत ने उठाए बड़े सवाल”, 400 अतिरिक्त वाहनों की जरूरत, फिर भी सौंदर्यीकरण पर खर्च, IGRS शिकायत पर तत्काल कार्रवाई की मांग

ग्रेटर नोएडा वेस्ट, रफ़्तार टूडे। एक तरफ शहर स्वच्छता सर्वेक्षण में शानदार प्रदर्शन कर देशभर में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। चमचमाती रिपोर्टों और पुरस्कारों के बीच शहर के कई हिस्सों में कूड़े के ढेर, जाम नालियां और बदहाल सड़कें लोगों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि आखिर स्वच्छता की असली तस्वीर क्या है? क्या सिर्फ सर्वेक्षण में बेहतर अंक हासिल करना ही पर्याप्त है या वास्तव में हर गली, मोहल्ले और वार्ड को साफ-सुथरा बनाना भी उतना ही जरूरी है?
ग्रेटर नोएडा वेस्ट के सेक्टर-112 स्थित सोरखा बारात घर के सामने का दृश्य इन सवालों को और गहरा कर रहा है। यहां सड़क किनारे जमा कचरे के ढेर और बदहाल सफाई व्यवस्था स्थानीय निवासियों की चिंता का कारण बने हुए हैं। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि नियमित रूप से कूड़ा नहीं उठाया जाता, जिसके कारण गंदगी बढ़ती जा रही है और आसपास रहने वाले लोगों को बदबू तथा संक्रमण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
स्वच्छता सर्वेक्षण में अव्वल, लेकिन जमीनी चुनौतियां बरकरार
शहर की उपलब्धियों की चर्चा तो खूब होती है, लेकिन गांवों और वार्डों में सफाई व्यवस्था की वास्तविक स्थिति अलग तस्वीर पेश करती है। कई स्थानों पर नालियां जाम हैं, सड़कों के किनारे कूड़े के ढेर लगे हुए हैं और नियमित सफाई व्यवस्था का अभाव देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक अंतिम व्यक्ति तक सफाई व्यवस्था नहीं पहुंचेगी, तब तक किसी भी पुरस्कार का वास्तविक महत्व अधूरा रहेगा।
400 अतिरिक्त वाहनों की जरूरत, फिर भी सौंदर्यीकरण पर खर्च
दो दिन पहले आयोजित एक समीक्षा बैठक में अधिकारियों ने स्वयं स्वीकार किया कि शहर में प्रभावी कचरा प्रबंधन के लिए करीब 400 अतिरिक्त वाहनों की आवश्यकता है। इसका मतलब साफ है कि मौजूदा संसाधन बढ़ती आबादी और बढ़ते कचरे के दबाव को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके बावजूद नगर निगम द्वारा रंगीन लाइटों, फव्वारों और अन्य सौंदर्यीकरण परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। ऐसे में नागरिकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या प्राथमिकता पहले बुनियादी सफाई व्यवस्था को नहीं मिलनी चाहिए? लोगों का कहना है कि शहर की सुंदरता तभी सार्थक होगी, जब सड़कें और गलियां भी साफ दिखाई दें।
समाज सेविका अंकिता राजपूत ने उठाए अहम सवाल
राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक कार्यों के लिए पहचान बना चुकी समाज सेविका अंकिता राजपूत ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि केवल पुरस्कार हासिल कर लेना ही स्वच्छता का प्रमाण नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि— “अवार्ड तस्वीरों और मंचों पर अच्छे लगते हैं, लेकिन वास्तविक स्वच्छता तब दिखाई देगी जब हर गली और हर मोहल्ला साफ होगा। यह समझना जरूरी है कि कचरा कहां से आ रहा है और उसका अंतिम निस्तारण किस प्रकार किया जा रहा है।”
अंकिता राजपूत का मानना है कि समस्या केवल कचरा उठाने की नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई अन्य कारण भी हैं, जिन पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।
डस्टबिन, जागरूकता और नियमित उठान पर देना होगा ध्यान
उन्होंने कहा कि शहर में कई स्थानों पर पर्याप्त संख्या में डस्टबिन उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा कचरा उठाने की आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) और लोगों में जागरूकता की कमी भी बड़ी समस्या है। उनका कहना है कि— हर वार्ड और कॉलोनी में पर्याप्त डस्टबिन लगाए जाएं।
नियमित समय पर कचरा उठाने की व्यवस्था सुनिश्चित हो।
नागरिकों को भी स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाए।
कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
IGRS शिकायत पर तत्काल कार्रवाई की मांग
समाज सेविका अंकिता राजपूत ने जिला प्रशासन से आग्रह किया है कि इस संबंध में दर्ज की गई IGRS शिकायत का तत्काल संज्ञान लिया जाए और अगले 48 घंटे के भीतर संबंधित क्षेत्र से कचरा हटाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
स्थानीय निवासियों में बढ़ रही नाराजगी
क्षेत्र के निवासियों का कहना है कि कई बार शिकायतें करने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा है। लोगों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं। स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि सफाई व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए जाएं और गांवों तथा वार्डों में विशेष अभियान चलाया जाए।
सिर्फ रैंकिंग नहीं, जमीनी बदलाव की जरूरत
विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसी भी शहर की असली पहचान उसकी साफ-सफाई और नागरिक सुविधाओं से होती है। यदि शहर को वास्तव में देश के सबसे स्वच्छ शहरों की सूची में स्थायी स्थान बनाना है, तो केवल रिपोर्ट और आंकड़ों से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस बदलाव लाने होंगे।



