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Kisan News : “तीन साल, पाँच चेहरे और बिखरता संगठन”, नोएडा में क्यों नहीं जम पा रही भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) की जड़ें?, किसान हित के नाम पर गठन, लेकिन राह में भटकता संगठन

नोएडा, रफ़्तार टूडे। किसानों के हक़ और अधिकारों की लड़ाई का दावा करने वाली भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) इन दिनों नोएडा महानगर में खुद अपनी पहचान और विश्वसनीयता के संकट से जूझती नज़र आ रही है। बीते तीन वर्षों में संगठन ने नोएडा महानगर अध्यक्ष के रूप में पाँच बार नेतृत्व बदला, लेकिन इसके बावजूद ज़मीनी स्तर पर संगठन की कोई ठोस पकड़ अब तक बनती दिखाई नहीं दे रही है।
यह आंकड़ा अपने आप में कई सवाल खड़े करता है—क्या संगठन सही दिशा में आगे बढ़ रहा है? क्या किसान हितों से ज़्यादा आंतरिक समीकरण और पदों की राजनीति हावी हो गई है? या फिर नोएडा जैसे शहरी-औद्योगिक क्षेत्र में किसान संगठन अपनी भूमिका तय ही नहीं कर पा रहा?


किसान हित के नाम पर गठन, लेकिन राह में भटकता संगठन
बताया जाता है कि करीब तीन वर्ष पूर्व भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) का गठन किसानों की समस्याओं, भूमि अधिग्रहण, मुआवज़ा, रोजगार और शहरीकरण से उपजे संकटों के खिलाफ एक मज़बूत आवाज़ बनने के उद्देश्य से किया गया था।
नोएडा जैसे क्षेत्र में, जहां किसान अपनी ज़मीन खोने, पुनर्वास और भविष्य की असुरक्षा से लगातार जूझ रहे हैं, वहां इस संगठन से बड़ी उम्मीदें थीं।
लेकिन समय बीतने के साथ-साथ यह उम्मीदें बार-बार नेतृत्व परिवर्तन की भेंट चढ़ती गईं।

पाँच अध्यक्ष, एक भी स्थायी चेहरा नहीं
अगर पिछले तीन वर्षों के घटनाक्रम पर नज़र डालें, तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है—
भूपेन्द्र शर्मा (निवासी नगलाचरण दास) को सबसे पहले नोएडा महानगर अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
इसके बाद संगठन ने कमान सौंपी हरेन्द्र चौधरी (बरौला) को।
फिर भरत प्रधान को यह पद मिला।
उसके बाद धर्मवीर चौहान को महानगर अध्यक्ष बनाया गया।
और अब हाल ही में, एक बार फिर नगलाचरण दास क्षेत्र से ही संदीप शर्मा को पाँचवां महानगर अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
तीन साल में पाँच अध्यक्ष—यानी औसतन हर सात-आठ महीने में नया चेहरा। यह आंकड़ा संगठन की अस्थिरता और आंतरिक खींचतान को बयां करने के लिए काफ़ी है।


“ज़मीन तलाशने” की राजनीति और भटकता एजेंडा
किसान संगठनों से जुड़े जानकारों और स्थानीय किसानों का कहना है कि नोएडा महानगर में अपनी ‘जमीन’ तलाशने के फेर में संगठन अपने मूल उद्देश्य से भटकता चला गया।
पद, प्रभाव और स्थानीय वर्चस्व की लड़ाई में संगठन बार-बार नेतृत्व बदलता रहा, लेकिन किसानों की समस्याओं पर कोई ठोस आंदोलन या निर्णायक पहल सामने नहीं आ सकी। किसानों का कहना है कि जब नेतृत्व ही स्थायी न हो, तो रणनीति कैसे बने?
आज अध्यक्ष बदलता है, कल पूरी टीम बदल जाती है—ऐसे में संगठन की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

किसानों के बीच उठते सवाल, फैलती चर्चाएं
नोएडा के ग्रामीण इलाकों में अब इस ताबड़तोड़ फेरबदल को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं।
कुछ किसानों का मानना है कि संगठन के भीतर आंतरिक कलह है, तो कुछ इसे “पद की राजनीति” का नतीजा बता रहे हैं। वहीं कई किसान यह भी पूछ रहे हैं कि—
क्या संगठन को वाकई किसानों की चिंता है?
या फिर नोएडा जैसे हाई-प्रोफाइल इलाके में नाम और पहचान बनाने की होड़ चल रही है?
एक बुज़ुर्ग किसान का कहना है,
“नेतृत्व ही हर साल बदल जाएगा तो हमारी लड़ाई कौन लड़ेगा? हमें नाम नहीं, काम चाहिए।”


भविष्य की राह: आत्ममंथन ज़रूरी

भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के लिए यह वक्त आत्ममंथन का है।
नोएडा जैसे क्षेत्र में किसान आंदोलन की ज़रूरत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, लेकिन उसके लिए—
स्थायी और भरोसेमंद नेतृत्व
स्पष्ट एजेंडा
और ज़मीनी संघर्ष की निरंतरता
अनिवार्य है।
अगर संगठन ने केवल पदों के फेरबदल पर ही ध्यान केंद्रित रखा, तो खतरा है कि किसान उससे दूरी बना लेंगे और यूनियन का अस्तित्व सिर्फ कागज़ों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सिमट कर रह जाएगा।

तीन साल में पाँच महानगर अध्यक्ष बदलना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि संगठन की दिशा और दशा का आईना है। अब देखना यह होगा कि नया नेतृत्व इस सिलसिले को तोड़कर किसानों के बीच भरोसा कायम कर पाता है या नहीं—
या फिर अगली खबर एक और नए महानगर अध्यक्ष की होगी
क्योंकि सवाल अब सिर्फ अध्यक्ष का नहीं, संगठन के भविष्य का है।

रफ़्तार टूडे की न्यूज
Raftar Today
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